विस्तृत उत्तर
गीता का सबसे प्रसिद्ध श्लोक
श्लोक (2.47)
*कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।*
*मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि।।*
अर्थ
तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, कर्म के फलों में कभी नहीं। न तो तुम कर्म के फलों के कारण बनो और न ही कर्म न करने में तुम्हारी आसक्ति हो।
यह श्लोक क्यों सर्वप्रसिद्ध है?
- 1यह कर्म योग का सार है और मानव जीवन की सबसे बड़ी दुविधा — 'फल की चिंता' — का समाधान देता है।
- 2यह किसी भी कार्यक्षेत्र में — छात्र, व्यापारी, सैनिक, गृहस्थ — सभी के लिए प्रेरणा है।
- 3वैज्ञानिक, दार्शनिक, राजनेता — सभी ने इसे उद्धृत किया है।
अन्य महत्वपूर्ण श्लोक
- ▸4.7-4.8 — 'यदा यदा हि धर्मस्य' (अवतार वचन)
- ▸9.22 — 'अनन्याश्चिन्तयन्तो माम्' (ईश्वर का वचन भक्त-रक्षा हेतु)
- ▸18.66 — 'सर्वधर्मान् परित्यज्य' (चरम शरणागति)
टिप्पणी: 2.47 सर्वाधिक उद्धृत, स्मरित और प्रचलित है, अतः यही सर्वप्रसिद्ध श्लोक माना जाता है।





