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भगवद गीता📜 भगवद्गीता अध्याय 2, 3, 4, 52 मिनट पठन

गीता में कर्म योग क्या है?

संक्षिप्त उत्तर

कर्म योग = फल की आसक्ति त्याग कर कर्तव्य-पालन। 'कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन' (2.47)। कोई एक क्षण कर्म-रहित नहीं रह सकता। निष्काम कर्म = मुक्ति। सकाम कर्म = बंधन। 'योगः कर्मसु कौशलम्' — कर्म में कुशलता ही योग।

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विस्तृत उत्तर

गीता में कर्म योग

कर्म' = करना/क्रिया (संस्कृत 'कृ' धातु)। 'योग' = जोड़ना/ईश्वर से मिलन। कर्म योग = फल की आसक्ति त्याग कर कर्तव्य-पालन करना।

मुख्य श्लोक

*'कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि।'* (गीता 2.47)

अर्थ: तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने पर है, फल में नहीं। न फल की आशा करो, न कर्म का त्याग।

कर्म योग के मूलभूत सिद्धांत

1निष्काम कर्म

फल की इच्छा के बिना कर्म करना। जो सकाम कर्म (फल-इच्छा से) करता है, वह संसार-बंधन में बँधता है। निष्काम कर्म मुक्ति का द्वार है।

2अकर्मता निषिद्ध

गीता 3.5 — *'न हि कश्चित् क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्'* — कोई भी एक क्षण भी कर्म किए बिना नहीं रह सकता। प्रकृति के तीन गुण कर्म करवाते हैं।

3स्वधर्म कर्म

अपने वर्ण-आश्रम के अनुसार कर्तव्य-पालन ही कर्म योग है। श्रीकृष्ण ने स्वयं कहा — *'योगः कर्मसु कौशलम्'* — कर्म में कुशलता ही योग है।

4लोकसंग्रह

ज्ञानी और महापुरुष समाज के कल्याण के लिए कर्म करते हैं — यह उच्चतम कर्म योग है (राजा जनक का उदाहरण)।

कर्म के भेद (गीता अनुसार)

  • सकाम कर्म: फल-इच्छा से किया कर्म (बंधन)
  • निष्काम कर्म: फलत्याग से किया कर्म (मुक्ति)
  • विकर्म: निषिद्ध कर्म (पाप)
  • अकर्म: कर्म करते हुए कर्ता-भाव न रखना (सर्वोच्च)।
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शास्त्रीय स्रोत
भगवद्गीता अध्याय 2, 3, 4, 5
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