विस्तृत उत्तर
गीता में कर्म योग
कर्म' = करना/क्रिया (संस्कृत 'कृ' धातु)। 'योग' = जोड़ना/ईश्वर से मिलन। कर्म योग = फल की आसक्ति त्याग कर कर्तव्य-पालन करना।
मुख्य श्लोक
*'कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि।'* (गीता 2.47)
अर्थ: तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने पर है, फल में नहीं। न फल की आशा करो, न कर्म का त्याग।
कर्म योग के मूलभूत सिद्धांत
1निष्काम कर्म
फल की इच्छा के बिना कर्म करना। जो सकाम कर्म (फल-इच्छा से) करता है, वह संसार-बंधन में बँधता है। निष्काम कर्म मुक्ति का द्वार है।
2अकर्मता निषिद्ध
गीता 3.5 — *'न हि कश्चित् क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्'* — कोई भी एक क्षण भी कर्म किए बिना नहीं रह सकता। प्रकृति के तीन गुण कर्म करवाते हैं।
3स्वधर्म कर्म
अपने वर्ण-आश्रम के अनुसार कर्तव्य-पालन ही कर्म योग है। श्रीकृष्ण ने स्वयं कहा — *'योगः कर्मसु कौशलम्'* — कर्म में कुशलता ही योग है।
4लोकसंग्रह
ज्ञानी और महापुरुष समाज के कल्याण के लिए कर्म करते हैं — यह उच्चतम कर्म योग है (राजा जनक का उदाहरण)।
कर्म के भेद (गीता अनुसार)
- ▸सकाम कर्म: फल-इच्छा से किया कर्म (बंधन)
- ▸निष्काम कर्म: फलत्याग से किया कर्म (मुक्ति)
- ▸विकर्म: निषिद्ध कर्म (पाप)
- ▸अकर्म: कर्म करते हुए कर्ता-भाव न रखना (सर्वोच्च)।





