विस्तृत उत्तर
गीता में भक्ति योग
गीता के 12वें अध्याय का नाम 'भक्तियोग' है। इसमें 20 श्लोक हैं।
प्रश्न
अर्जुन ने पूछा — हे भगवन! जो निरंतर आपकी सगुण-साकार उपासना करते हैं और जो आपके निराकार-अव्यक्त रूप की उपासना करते हैं — इन दोनों में से कौन उत्तम योगी है?
श्रीकृष्ण का उत्तर (12.2)
*'मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते। श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः।'*
जो श्रद्धापूर्वक मुझमें मन लगाकर सगुण रूप की उपासना करते हैं — वे मुझे सर्वोत्तम योगी लगते हैं।
सगुण vs निर्गुण
निर्गुण ब्रह्म की उपासना कठिन है — देहधारी मनुष्य के लिए सगुण भक्ति सहज और सुलभ है।
भक्त के लक्षण (12.13-19)
- ▸सभी प्राणियों से द्वेष-रहित
- ▸मित्र-शत्रु में समान
- ▸सुख-दुख, मान-अपमान में समभाव
- ▸संतोषी और संन्यासी-भाव
- ▸ईश्वर में दृढ़ आस्था
भक्ति के स्तर (गीता 12.11-12)
- 1सर्वकर्म ईश्वर को अर्पित करना
- 2यदि यह संभव न हो — निरंतर अभ्यास
- 3यदि अभ्यास संभव न हो — केवल कर्मफल त्याग
*'श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्धयानं विशिष्यते। ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्।'* (12.12) — अभ्यास से ज्ञान, ज्ञान से ध्यान, ध्यान से फलत्याग श्रेष्ठ है — फलत्याग से तुरंत शांति।





