ब्रह्माण्ड पुराण के अंतर्गत मोक्षदा एकादशी व्रत-कथा: युधिष्ठिर-श्रीकृष्ण संवाद
प्रथम अध्याय: पारंपरिक प्रारंभ - धर्मराज युधिष्ठिर की जिज्ञासा एवं भगवान श्रीकृष्ण द्वारा माहात्म्य-वर्णन
परम पावन और समस्त पापों का नाश करने वाले ब्रह्माण्ड पुराण तथा पद्म पुराण में वर्णित परम कल्याणकारी मोक्षदा एकादशी के माहात्म्य का आरंभ एक अत्यंत दिव्य और लोकमंगलकारी संवाद से होता है। कुरुक्षेत्र के प्रांगण में अथवा धर्मसभा में विराजमान पाण्डुकुल भूषण, धर्मराज युधिष्ठिर ने करबद्ध होकर, अत्यंत विनय, श्रद्धा और भक्तिभाव से चराचर जगत के स्वामी, त्रिलोकीनाथ भगवान श्रीकृष्ण के चरण कमलों में साष्टांग प्रणाम किया ।
धर्मराज युधिष्ठिर ने अपनी अंजलि बांधकर भगवान से अत्यंत विनीत स्वर में प्रार्थना करते हुए कहा, "हे देवदेवेश्वर! हे कमलनयन! हे ब्रह्मांड के रचयिता और सम्पूर्ण प्रजा के पालक! हे माधव! मैं आपके श्रीचरणों में बारंबार प्रणाम करता हूँ । हे प्रभु! आप ही इस सम्पूर्ण चराचर जगत के आदि, मध्य और अंत हैं। आप तीनों लोकों के स्वामी हैं और सम्पूर्ण जगत के जीवों का कल्याण करने वाले एकमात्र आश्रय हैं । हे जगन्नाथ! संसार के सभी प्राणी आपके कृपापात्र हैं और आप सभी के शुभचिंतक हैं । हे त्रिलोकीनाथ! मेरे मन में एक अत्यंत गहन जिज्ञासा उत्पन्न हुई है, जो सम्पूर्ण मानव जाति के कल्याण से जुड़ी है। कृपया मेरे इस संशय का निवारण कर मुझे और इस सम्पूर्ण जगत को कृतार्थ करें ।"
युधिष्ठिर ने आगे पूछा, "हे माधव! हे कमलनयन! कृपा करके यह बताने का कष्ट करें कि मार्गशीर्ष मास (अगहन मास) के शुक्ल पक्ष में जो परम पवित्र एकादशी आती है, उसका क्या नाम है? उस मंगलकारी एकादशी की विधि क्या है? उस पावन तिथि पर किस देवता का विधि-विधान से पूजन किया जाना चाहिए? हे स्वामिन्! आप जीवों के कल्याण हेतु इस एकादशी का सम्पूर्ण माहात्म्य मुझे विस्तारपूर्वक और यथार्थ रूप से सुनाने की कृपा करें, जिससे संसार के सभी जीवों का उद्धार हो सके ।"
धर्मराज युधिष्ठिर के इन धर्मयुक्त, लोकमंगलकारी और परोपकार से परिपूर्ण वचनों को सुनकर देवों के देव भगवान श्रीकृष्ण ने मंद-मंद मुस्कुराते हुए अत्यंत मधुर वाणी में कहा, "हे नृपश्रेष्ठ! हे कुंतीपुत्र युधिष्ठिर! तुमने सम्पूर्ण मानव जाति के कल्याण और तीनों लोकों के हित के लिए अत्यंत उत्तम और मंगलकारी प्रश्न किया है । तुम्हारे इस प्रश्न से तुम्हारी कीर्ति युगों-युगों तक इस संसार में स्थापित रहेगी । हे राजन्! मैं तुम्हारे प्रश्न से अत्यंत प्रसन्न हूँ। अब तुम एकाग्रचित्त होकर उस परम पवित्र एकादशी का वर्णन श्रवण करो。
हे धर्मराज! मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष में जो महान एकादशी आती है, वह सम्पूर्ण पापों का हरण करने वाली, जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति दिलाने वाली और जीवों को परम गति (मोक्ष) प्रदान करने वाली है। इसी कारण से इस परम पवित्र और मंगलकारी एकादशी को तीनों लोकों में 'मोक्षदा एकादशी' के नाम से जाना जाता है ।
हे राजन्! इस मोक्षदा एकादशी के दिन भगवान विष्णु के 'दामोदर' स्वरूप की पूर्ण विधि-विधान से पूजा-आराधना करने का शास्त्रों में विधान है । जो भी साधक इस दिन पूर्ण श्रद्धा, निष्ठा और भक्ति के साथ धूप, दीप, नैवेद्य, सुगन्धित पुष्पों और तुलसी की मंजरी (तुलसी दल) से भगवान दामोदर का पूजन करता है, उसके पूर्व जन्मों के और इस जन्म के सम्पूर्ण पाप भस्म हो जाते हैं । यह मोक्षदा एकादशी बड़े-बड़े और घोर पातकों का समूल नाश करने वाली है。
इस एकादशी की रात्रि में मेरी प्रसन्नता और कृपा प्राप्ति के निमित्त साधक को नृत्य, भजन, कीर्तन, स्तुति और जागरण करना चाहिए । हे युधिष्ठिर! जिनके पूर्वज या पितर अपने पाप कर्मों के वशीभूत होकर नीच योनि या नरक में पड़े हुए हैं, यदि उनके वंशज इस एकादशी का व्रत करके इसका पुण्य अपने पितरों को दान कर दें, तो वे पितर तत्काल नरक की यातनाओं से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त होते हैं । इसमें तनिक भी संदेह नहीं है。
हे नृपश्रेष्ठ! अब मैं तुम्हें इस मोक्षदा एकादशी के अद्भुत प्रभाव और इसके माहात्म्य से जुड़ी एक अत्यंत प्राचीन, ऐतिहासिक और मंगलकारी कथा सुनाता हूँ । इस पावन कथा के श्रवण मात्र से ही वाजपेय यज्ञ के समान महान पुण्य की प्राप्ति होती है और यह कथा श्रोता के सभी पापों को हर लेती है । तुम इस कथा को पूर्ण एकाग्रता और श्रद्धा के साथ श्रवण करो।"
द्वितीय अध्याय: गोकरण (चम्पक) नगर का वैभव एवं धर्मात्मा राजा वैखानस का परिचय
भगवान श्रीकृष्ण कथा का आरंभ करते हुए कहते हैं— हे राजन्! पूर्वकाल (प्राचीन काल) की बात है, इस पृथ्वी पर एक अत्यंत सुंदर, समृद्ध और अलौकिक नगर हुआ करता था। इस परम रमणीय नगर को चम्पक नगर (तथा स्थानीय और प्रचलित पौराणिक परंपराओं में गोकरण क्षेत्र/नगर के नाम से भी) जाना जाता था ।
यह चम्पक (गोकरण) नगर अद्वितीय शोभा से संपन्न था। यह नगर वैष्णवों (भगवान विष्णु के अनन्य भक्तों) से विभूषित था । नगर के प्रत्येक घर में भगवान श्री हरि की भक्ति, पूजा और संकीर्तन का नाद गूंजता रहता था। इस नगर में निवास करने वाले ब्राह्मण अत्यंत विद्वान थे। वे सभी चारों वेदों के उद्भट विद्वान, शास्त्रों के पारंगत ज्ञाता और धर्म-कर्म में पूर्णतः निष्णात थे । नगर के नागरिक अत्यंत सदाचारी, सत्यवक्ता और धर्म के मार्ग पर चलने वाले थे。
इस परम पवित्र चम्पक नगर में 'वैखानस' नाम के एक अत्यंत प्रतापी, तेजस्वी और महान धर्मात्मा राजा राज्य करते थे । राजा वैखानस सर्वगुण संपन्न थे। वे अत्यंत दयालु, सत्यनिष्ठ, पराक्रमी और अपनी प्रजा से निस्वार्थ प्रेम करने वाले शासक थे। उनके राज्य में कोई भी प्राणी दुखी, दरिद्र, रोगग्रस्त या शोक संतप्त नहीं था。
वे अपनी प्रजा का पालन-पोषण ठीक उसी प्रकार करते थे, जिस प्रकार एक स्नेही पिता अपने औरस पुत्रों और पुत्रियों का पालन करता है । राजा वैखानस के राज्य में धर्म अपने चारों चरणों से पूर्णतः स्थापित था। कोई भी व्यक्ति धर्म की मर्यादा का उल्लंघन नहीं करता था। राज्य में सर्वत्र सुख, शांति और समृद्धि का वास था। राजा स्वयं भी धर्म के मार्ग पर चलते हुए न्यायपूर्वक पृथ्वी का शासन कर रहे थे । राजा के न्यायपूर्ण और धर्मानुकूल शासन के कारण उनकी प्रजा सदैव अत्यंत प्रसन्न और संतुष्ट रहती थी ।
तृतीय अध्याय: एक रात्रि स्वप्न में पिता को नरक में कष्ट भोगते देखना
इस प्रकार अपनी प्रजा का निष्कंटक और धर्मपूर्ण पालन करते हुए धर्मात्मा राजा वैखानस का समय अत्यंत आनंदपूर्वक व्यतीत हो रहा था। राजा को अपने राज्य, वैभव या जीवन से कोई भी शिकायत नहीं थी。
तभी एक दिन, जब दिन का कार्य समाप्त करने के पश्चात राजा अपनी शय्या पर विश्राम कर रहे थे और गहरी निद्रा में थे, तो रात्रि के मध्य प्रहर में उन्होंने एक अत्यंत भयानक, हृदयविदारक और विचलित कर देने वाला स्वप्न देखा ।
राजा वैखानस ने अपने स्वप्न में देखा कि यमलोक का दृश्य उपस्थित है और उनके मृत पिता (पूर्वज) यमराज के भयंकर और नीच नरक (नरक योनि) में पड़े हुए हैं । राजा ने देखा कि उनके पिता नरक की भयंकर यातनाएं झेल रहे हैं । नरक की प्रज्वलित अग्नि, यमदूतों के कठोर प्रहार और वहां की वीभत्स यातनाओं के कारण उनके पिता अत्यंत व्याकुल होकर करुण क्रंदन और विलाप कर रहे थे ।
स्वप्न में यातनाएं सहते हुए पिता ने अत्यंत दीन, असहाय और करुण भाव से राजा वैखानस की ओर देखा। अपने पुत्र को सम्मुख पाकर पिता ने बारंबार रोते हुए और विलाप करते हुए पुकार लगाई, "हे पुत्र! हे बेटा वैखानस! मैं इस नरक के भयंकर समुद्र में अत्यंत भीषण कष्ट भोग रहा हूँ । मेरे दुःख का कोई अंत नहीं है। तुम मेरे अपने शरीर से उत्पन्न मेरे औरस पुत्र (तनुज) हो । अपने पिता को इस घोर नरक की पीड़ा, यातनाओं और इस असीम दुःख के सागर से बाहर निकालो। हे पुत्र! तुम्हारे अतिरिक्त मेरा इस दुःख से उद्धार करने वाला अन्य कोई नहीं है, तुम ही मुझे इस नरक से छुटकारा दिला सकते हो ।"
अपने पूज्य पिता की ऐसी अत्यंत दयनीय, दुःखद और भयावह अवस्था को देखकर तथा उनके करुण आर्तनाद और विलाप को सुनकर राजा वैखानस भयभीत हो गए। इस विस्मयकारी और भयावह दृश्य से राजा की निद्रा तत्काल भंग हो गई । निद्रा टूटते ही राजा विस्मय, भय और भयंकर दुःख के सागर में डूब गए। अपने पिता के उस घोर कष्ट और आर्तनाद को स्मरण करके राजा का हृदय विदीर्ण होने लगा। उनका शरीर कांप उठा और वे पसीने से तर-बतर हो गए । उस रात्रि फिर राजा को क्षण भर के लिए भी निद्रा नहीं आई。
चतुर्थ अध्याय: राजा का दुःख, चिंता और ब्राह्मणों एवं ऋषियों से परामर्श
रात्रि किसी प्रकार व्यतीत हुई। प्रातःकाल होते ही राजा वैखानस अत्यंत व्याकुल, क्षुब्ध और अशांत अवस्था में अपनी राजसभा में पहुँचे। राजा ने अविलंब राज्य के सभी ज्ञानी ब्राह्मणों, ऋषियों, मुनियों, वेदज्ञों और अपने सभी प्रमुख मंत्रियों को सभा में आमंत्रित किया ।
जब सभी विद्वान सभा में उपस्थित हो गए, तब राजा वैखानस ने अत्यंत क्षुब्ध हृदय, रुंधे हुए कंठ और अश्रुपूर्ण नेत्रों से ब्राह्मणों को संबोधित करते हुए कहा, "हे द्विजश्रेष्ठ! हे विद्वान ब्राह्मणों! मैंने बीती रात्रि एक अत्यंत भयंकर और अशुभ स्वप्न देखा है। मैंने स्वप्न में अपने पूज्य पितरों (पिता) को नीच नरक की भयंकर अग्नि में गिरे हुए और असहनीय यातनाएं सहते हुए देखा है ।
वे नरक में बार-बार रूदन और क्रंदन करते हुए, अत्यंत दीन भाव से मुझसे कह रहे थे कि— 'हे पुत्र! तुम हमारे तनुज हो, इसलिए इस घोर नरक के समुद्र से हमारा उद्धार करो ।'
हे विप्रवरो! अपने पिता की इस घोर और शोचनीय अवस्था को देखकर मैं अत्यंत विचलित हूँ। मेरा हृदय रुँधा जा रहा है और मुझे एक क्षण के लिए भी चैन नहीं मिल रहा है । मैंने अपनी पत्नी को भी यह व्यथा सुनाई है कि पिता के इस कष्ट को देखकर मैं बहुत अशांत हूँ । इस स्वप्न को देखने के पश्चात् मुझे यह विशाल राज्य, अपार धन-संपत्ति, हाथी, घोड़े, और यहाँ तक कि मेरी पत्नी और पुत्र भी तनिक सुख और आनंद प्रदान नहीं कर पा रहे हैं । सब कुछ मुझे व्यर्थ प्रतीत हो रहा है。
जिस बलवान, साहसी और साधन-संपन्न पुत्र के जीते जी, उसके माता-पिता ऐसे घोर नरक में पड़े हुए हों और यातनाएं भोग रहे हों, उस पुत्र के जीवन का इस संसार में क्या लाभ है? उसका तो सारा जीवन ही सर्वथा व्यर्थ और धिक्कार योग्य है ।
हे ब्राह्मण श्रेष्ठ! हे द्विजोत्तमो! मेरी मति भ्रमित हो गई है। मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा है कि मैं क्या करूँ? कहाँ जाऊँ? आप लोग सभी शास्त्रों के पारंगत ज्ञाता हैं। कृपया मुझे कोई ऐसा सुनिश्चित मार्ग सुझाइए, कोई ऐसा महान व्रत, तप, दान या योग बताइये जिसके करने से और जिसके पुण्य के प्रभाव से मेरे पूर्वजों का इस नरक से तत्काल उद्धार हो सके और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हो ।"
राजा की इस करुण पुकार, पितृभक्ति और गहन व्यथा को सुनकर राजसभा में उपस्थित सभी ब्राह्मण और मंत्री अत्यंत चिंतित हुए। राजा के दुःख से वे भी द्रवित हो गए। कुछ समय तक शास्त्रों का मंथन और आपस में गहन विचार-विमर्श करने के पश्चात् उन ब्राह्मणों ने राजा से कहा, "हे नृपश्रेष्ठ! हे राजन्! यहाँ से कुछ ही दूरी पर पर्वत मुनि (पर्वतक ऋषि) का एक महान और पवित्र आश्रम स्थित है ।
वे पर्वत मुनि अत्यंत महान तपस्वी, त्रिकालदर्शी (भूत, वर्तमान और भविष्य को जानने वाले) और सर्वज्ञाता हैं । उनसे इस संसार का कोई भी रहस्य छिपा नहीं है। वे आपके पिता के इस नरक भोग का यथार्थ कारण और उससे मुक्ति का अचूक उपाय अवश्य बता सकेंगे। हे राजन्! आप बिना विलंब किए उन महान पर्वत मुनि के आश्रम में जाएँ और उनकी शरण ग्रहण करें ।"
पंचम अध्याय: पर्वत मुनि के आश्रम हेतु प्रस्थान एवं मार्गदर्शन
ज्ञानवृद्ध ब्राह्मणों का यह उचित परामर्श सुनकर राजा वैखानस को तनिक सांत्वना मिली और अंधकार में आशा की एक किरण दिखाई दी। अपनी पत्नी और ब्राह्मणों की सलाह को शिरोधार्य करते हुए, राजा बिना कोई समय व्यर्थ किए तत्काल अपने कुछ विश्वस्त सेवकों के साथ पर्वत मुनि के उस पावन आश्रम की ओर प्रस्थान कर गए ।
हिमालय के समीप उस सुरम्य और एकांत आश्रम में पहुँचकर राजा ने देखा कि पर्वत मुनि अपने आसन पर विराजमान हैं। अनेक ऋषि-मुनि उनकी सभा में बैठे हैं और उनके मुखमंडल से ब्रह्मतेज प्रस्फुटित हो रहा है । राजा वैखानस ने अत्यंत श्रद्धा, विनय और नम्रतापूर्वक आगे बढ़कर पर्वत मुनि को साष्टांग दंडवत प्रणाम किया और उनके श्रीचरणों का स्पर्श किया ।
पर्वत मुनि ने राजा को आशीर्वाद दिया और अत्यंत मधुर वाणी में उनका कुशल-मंगल पूछा। मुनि ने कहा, "हे राजन्! आपके राज्य के सातों अंग (राजा, मंत्री, सुहृद/मित्र, खजाना, राष्ट्र, दुर्ग और सेना) कुशलपूर्वक तो हैं? आपके राज्य में धर्म का पालन तो भली-भांति हो रहा है?"
राजा वैखानस ने हाथ जोड़कर विनयपूर्वक उत्तर दिया, "हे स्वामिन्! हे ऋषिवर! आपकी असीम कृपा से मेरे राज्य के सातों अङ्ग पूर्णतः सकुशल हैं और प्रजा में सुख-शांति है । किंतु हे मुनिश्रेष्ठ! बाहर से सब कुछ कुशल होते हुए भी, मेरे हृदय में एक महान दुःख और चिंता ने घर कर लिया है, जिसके निवारण हेतु मैं आपकी शरण में आया हूँ。
हे स्वामिन्! मैंने स्वप्न में अपने पिता को नरक की भयंकर यातनाएं भोगते हुए देखा है । उन्होंने अत्यंत रुदन करते हुए मुझसे अपनी मुक्ति की गुहार लगाई है। हे मुनिवर! मुझे समझ नहीं आ रहा कि किस पुण्य कर्म, तप या व्रत के प्रभाव से मेरे पिता को इस घोर नरक से मुक्ति प्राप्त होगी। कृपया आप अपने दिव्य ज्ञान-चक्षुओं से देखकर मेरी इस व्यथा का समाधान करें और मेरे पिता के उद्धार का मार्ग प्रशस्त करें ।"
षष्ठ अध्याय: मुनि द्वारा पूर्वकर्म का दर्शन एवं पाप का कारण स्पष्ट करना
राजा वैखानस की पीड़ा और उनके पितृ-प्रेम को देखकर त्रिकालदर्शी पर्वत मुनि ने अपने नेत्र बंद कर लिए और पूर्ण योग-बल से ध्यानमग्न हो गए । कुछ समय तक गंभीर ध्यान और चिंतन करने के पश्चात् पर्वत मुनि ने अपनी आँखें खोलीं ।
मुनि ने राजा को संबोधित करते हुए कहा, "हे राजन्! मैंने अपने तपोबल और दिव्य दृष्टि से तुम्हारे पिता के पूर्व जन्म और उनके द्वारा किए गए कर्मों का पूर्ण वृत्तांत जान लिया है । तुम्हारे पिता अपने पिछले जन्म में किये गए एक महान पाप कर्म का भयंकर फल इस समय नरक में भोग रहे हैं ।
हे राजन्! पूर्व जन्म में तुम्हारे पिता ने अपनी पत्नी (अर्थात तुम्हारी माता) के प्रति एक घोर अपराध किया था। उन्होंने कामातुर होकर और अपनी दूसरी पत्नी (सौत) के वशीभूत होकर अपनी पहली पत्नी को अत्यंत यातनाएं दी थीं और उनके साथ अत्यंत क्रूर व्यवहार किया था । काम के वशीभूत होकर उन्होंने अपनी सती-साध्वी पत्नी को 'ऋतु-दान' (संतान उत्पत्ति का अधिकार) नहीं दिया था ।
अपनी पत्नी की उचित मांग की उपेक्षा करने, उसे घोर मानसिक और शारीरिक कष्ट देने तथा इसी क्रूर व्यवहार के भयंकर पाप कर्म के फलस्वरूप, मृत्यु के पश्चात् वे इस समय यमराज के नरक में गिरे हुए हैं और इस घोर यातना को भोगने के लिए विवश हैं । जो भी व्यक्ति अपनी पत्नी के साथ ऐसा क्रूर आचरण करता है, उसे अकारण यातनाएं देता है और उसके अधिकारों का हनन करता है, उसे अंततः ऐसे ही नरक का भागी बनना पड़ता है।"
यह सत्य वृत्तांत सुनकर राजा वैखानस का हृदय कांप उठा। उन्होंने अत्यंत दीन भाव से मुनि के चरण पकड़ लिए और प्रार्थना की, "हे ऋषिवर! हे दयानिधे! मेरे पिता ने अज्ञानवश या कामवश जो भी पाप किया है, उसका कठोर दंड वे भोग रहे हैं। किंतु एक पुत्र होने के नाते मेरा यह परम धर्म है कि मैं उन्हें इस भयंकर संकट से उबारूँ । हे मुनिश्रेष्ठ! कृपया मुझे कोई ऐसा उपाय, कोई ऐसा सुनिश्चित व्रत या दान बताइये जिसके महान पुण्य के प्रताप से मेरे पिता के इस पूर्व जन्म के पाप का पूर्णतः शमन हो जाए और वे इस भयंकर नरक की यातना से सदा के लिए मुक्त हो जाएँ ।"
सप्तम अध्याय: मुनि द्वारा मोक्षदा एकादशी व्रत का उपदेश
पर्वत मुनि ने राजा वैखानस की अगाध पितृभक्ति और करुणा से अत्यंत प्रसन्न होकर कहा, "हे राजन्! तुम शोक का त्याग करो । तुम्हारे पिता की मुक्ति का एक अत्यंत प्रभावशाली, पवित्र और अमोघ उपाय है। सम्पूर्ण मासों में सबसे उत्तम मार्गशीर्ष मास है । इस मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष में जो एकादशी आती है, उसे 'मोक्षदा एकादशी' कहा जाता है ।
हे राजन्! यह मोक्षदा एकादशी बड़े से बड़े पापों को भस्म करने वाली और पितरों को सीधे नर्क से निकाल कर मोक्ष की ओर ले जाने वाली है। तुम अपने सम्पूर्ण कुटुंब, पत्नी, पुत्रों, सेवकों और बंधु-बांधवों सहित इस मोक्षदा एकादशी का पूर्ण विधि-विधान पूर्वक और अटूट श्रद्धा के साथ उपवास करो ।
इस व्रत के दिन निराहार रहकर भगवान दामोदर (श्री विष्णु) की आराधना करो और रात्रि में जागरण करो। जब यह व्रत पूर्ण हो जाए, तो पारण के समय संकल्प करके इस उपवास के सम्पूर्ण अर्जित पुण्य को अपने पिता के निमित्त अर्पित (दान) कर दो ।
हे नृपश्रेष्ठ! तुम्हारे द्वारा किए गए इस मोक्षदा एकादशी के व्रत और उस पुण्य के दान के प्रताप से तुम्हारे पिता के सारे पाप तत्काल नष्ट हो जाएंगे और उन्हें अवश्य ही नरक से तत्काल मुक्ति प्राप्त होगी । इस उपाय से भिन्न उनके उद्धार का अन्य कोई मार्ग नहीं है।"
अष्टम अध्याय: श्रद्धापूर्वक व्रत-पालन एवं पुण्य-दान
पर्वत मुनि के इन परम कल्याणकारी और आश्वासन भरे वचनों को सुनकर राजा वैखानस के संतप्त मन को अत्यंत सांत्वना मिली। उनकी चिंता का शमन हुआ। उन्होंने मुनि के चरणों में पुनः बारंबार साष्टांग प्रणाम किया और उनकी आज्ञा एवं आशीर्वाद प्राप्त कर अपने महल की ओर लौट आए ।
महल में लौटकर राजा ने मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि के आगमन की उत्सुकतापूर्वक प्रतीक्षा की। जब 'मोक्षदा एकादशी' का वह परम पवित्र दिन आया, तो पर्वत मुनि द्वारा बताए गए विधान के अनुसार राजा वैखानस ने अपनी पत्नी, पुत्रों, सेवकों, संबंधियों और सम्पूर्ण कुटुंब सहित अत्यंत श्रद्धा, भक्ति और निष्ठा के साथ इस व्रत का पालन किया ।
राजा ने पूर्ण उपवास रखा। उन्होंने धूप, दीप, नैवेद्य और तुलसी मंजरी से भगवान दामोदर का विधिपूर्वक पूजन किया और रात्रि में भगवान के नाम का संकीर्तन करते हुए कुटुंब सहित पूर्ण जागरण किया ।
अगले दिन, द्वादशी तिथि को व्रत के पारण के समय, राजा वैखानस ने विद्वान ब्राह्मणों की उपस्थिति में हाथों में जल और अक्षत लेकर यह दृढ़ संकल्प किया— "मैंने अपने कुटुंब सहित इस मोक्षदा एकादशी का जो भी महान पुण्य अर्जित किया है, वह सम्पूर्ण पुण्य मैं अपने पिता को नरक की यातनाओं से मुक्त करने के निमित्त अर्पण (दान) करता हूँ ।" यह पवित्र संकल्प करते ही राजा ने वह जल भूमि पर छोड़ दिया。
नवम अध्याय: व्रत-फल से पिता की नरक से मुक्ति एवं स्वर्ग गमन
भगवान श्रीकृष्ण धर्मराज युधिष्ठिर से कहते हैं— हे युधिष्ठिर! राजा वैखानस द्वारा अपने व्रत का पुण्य संकल्पित करते ही ब्रह्मांड में एक अद्भुत चमत्कार हुआ। मोक्षदा एकादशी के उस अक्षय पुण्य का प्रभाव तत्काल यमलोक तक पहुँच गया ।
उस अमोघ और पवित्र पुण्य के प्रताप से राजा के पिता के पूर्व जन्म के वे सभी भयंकर पाप, जिसके कारण वे नरक की अग्नि में जल रहे थे, क्षण भर में ही भस्म होकर राख हो गए । नरक की बेड़ियाँ स्वतः टूट गईं और उनके पिता सभी यातनाओं से पूर्णतः मुक्त हो गए ।
पिता के पाप मुक्त होते ही स्वर्ग से देवताओं ने देवदूतों को भेजा और उसी क्षण आकाश से राजा वैखानस के ऊपर दिव्य पुष्पों की अद्भुत वर्षा होने लगी । स्वर्ग के दूतों द्वारा राजा के पिता को ससम्मान नरक से निकालकर उत्तम लोक (स्वर्ग लोक) की ओर ले जाया जाने लगा ।
स्वर्ग की ओर प्रस्थान करते हुए, अपने पुत्र की इस अगाध पितृभक्ति और मोक्षदा एकादशी के महान प्रभाव से गदगद होकर, राजा के पिता ने आकाश मार्ग से ही अपने पुत्र को दर्शन दिए। उन्होंने अत्यंत प्रसन्न होकर अपने पुत्र को आशीर्वाद देते हुए कहा, "हे पुत्र! तेरा कल्याण हो! (बेटा! तुम्हारा कल्याण हो) । आज तुम्हारे ही किए गए इस महान व्रत के पुण्य से मुझे इस नरक के भयंकर अंधकार और कष्टों से मोक्ष प्राप्त हुआ है।"
यह पवित्र वचन कहकर और अपने पुत्र को ढेरों आशीर्वाद देकर वे पितर देवताओं के दूतों के साथ सीधे स्वर्ग लोक (उत्तम लोक) को प्रस्थान कर गए । इस प्रकार राजा वैखानस का शोक समाप्त हुआ और उन्होंने अपना शेष जीवन धर्मपूर्वक व्यतीत किया。
दशम अध्याय: पारंपरिक फल-श्रुति एवं कथा का समापन
कथा का समापन करते हुए भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर से कहा— "हे राजन्! जो भी मनुष्य इस प्रकार पूर्ण श्रद्धा, नियम और भक्ति के साथ इस कल्याणमयी 'मोक्षदा एकादशी' का व्रत करता है, उसके सम्पूर्ण पाप तत्काल नष्ट हो जाते हैं ।
यह व्रत चिन्तामणि (इच्छा पूर्ण करने वाली मणि) के समान है, जो मनुष्य की समस्त अभीष्ट कामनाओं को पूर्ण करने वाला है । तीनों लोकों में इस मोक्षदा एकादशी के व्रत से बढ़कर मोक्ष प्रदान करने वाला और पितरों का उद्धार करने वाला दूसरा कोई भी उत्तम व्रत नहीं है ।
जो भी साधक स्वयं के लिए अथवा अपने पितरों के लिए पूर्ण निष्ठा से इस व्रत का पालन करता है, वह जीवन पर्यन्त सभी सुखों को भोगकर अंत में भगवान के परम धाम (मोक्ष) को प्राप्त होता है और उसे मृत्यु के पश्चात कभी नरक के दर्शन नहीं करने पड़ते ।
हे युधिष्ठिर! जो भी व्यक्ति श्रद्धापूर्वक इस मोक्षदा एकादशी के माहात्म्य और इस परम पवित्र व्रत-कथा को पढ़ता है, अथवा एकाग्रचित्त होकर इसका श्रवण करता है, उसे महान 'वाजपेय यज्ञ' के करने के समान उत्तम फल की प्राप्ति होती है । इस कथा का श्रवण मात्र ही मनुष्य के सारे पापों का शमन कर उसके लिए मोक्ष के द्वार खोल देता है।"