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भगवद गीता⏱ 2 मिनट पठन

गीता के तीसरे अध्याय कर्मयोग का सारांश क्या है?

तीसरा अध्याय निष्काम कर्म का उपदेश देता है। कर्म अनिवार्य है; फल की आसक्ति छोड़कर यज्ञ भावना से करें।

संक्षिप्त उत्तर

तीसरा अध्याय निष्काम कर्म का उपदेश देता है। कर्म अनिवार्य है; फल की आसक्ति छोड़कर यज्ञ भावना से करें। लोकसंग्रह के लिए ज्ञानी को भी कर्म जरूरी। काम ही सबसे बड़ा शत्रु।

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विस्तृत उत्तर

श्रीमद् भगवद गीता का तीसरा अध्याय 'कर्मयोग' नाम से जाना जाता है और इसमें 43 श्लोक हैं। यह अध्याय गीता के सबसे महत्वपूर्ण अध्यायों में से एक है।

अध्याय का आरंभ अर्जुन के प्रश्न से होता है। जब श्रीकृष्ण ने दूसरे अध्याय में ज्ञान को श्रेष्ठ बताया था, तो अर्जुन ने पूछा कि फिर आप मुझे इस भयंकर युद्धरूपी कर्म में क्यों लगाना चाहते हैं?

भगवान श्रीकृष्ण का उत्तर: श्रीकृष्ण बताते हैं कि कोई भी प्राणी एक क्षण के लिए भी बिना कर्म किए नहीं रह सकता। प्रकृति के तीन गुण (सत्व, रज, तम) सभी को कर्म करने के लिए बाध्य करते हैं। जो व्यक्ति बाह्य रूप से कर्म त्याग कर देता है लेकिन मन में विषयों की आसक्ति रखता है, वह मूढ़ और ढोंगी है।

अध्याय का केंद्रीय संदेश: यज्ञ भावना से किया गया कर्म बंधनकारी नहीं होता। यज्ञ से वर्षा, वर्षा से अन्न, अन्न से प्राणी और प्राणियों के कर्म से फिर यज्ञ — यह सृष्टि का चक्र चलता रहता है। जो इस चक्र में भाग नहीं लेता वह पाप का भागी होता है।

लोकसंग्रह का सिद्धांत: श्रीकृष्ण राजा जनक का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि ज्ञानी पुरुष को भी समाज के मार्गदर्शन के लिए कर्म करना चाहिए क्योंकि श्रेष्ठ पुरुष जो करते हैं, सामान्य जन उसका अनुसरण करते हैं।

काम ही शत्रु है: अध्याय के अंत में श्रीकृष्ण बताते हैं कि काम (इच्छा) ही मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है। इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि इसके निवासस्थान हैं। इसे जीतकर ही मनुष्य आत्मज्ञान और मोक्ष प्राप्त कर सकता है।

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