विस्तृत उत्तर
श्रीमद् भगवद गीता का चौथा अध्याय 'ज्ञानकर्मसंन्यासयोग' कहलाता है और इसमें 42 श्लोक हैं।
अध्याय का प्रारंभ: श्रीकृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि यह योग का ज्ञान उन्होंने सबसे पहले विवस्वान (सूर्यदेव) को दिया था, फिर सूर्यदेव ने मनु को और मनु ने इक्ष्वाकु को। इस प्रकार परंपरा से चला आ रहा यह ज्ञान कालांतर में लुप्त हो गया था।
अवतार का सिद्धांत: इसी अध्याय में श्रीकृष्ण अवतार का प्रसिद्ध श्लोक कहते हैं — 'यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत...' जब-जब धर्म की हानि होती है, तब-तब भगवान जन्म लेते हैं, साधुओं की रक्षा, दुष्टों के विनाश और धर्म की स्थापना के लिए।
कर्म का रहस्य: श्रीकृष्ण कर्म, अकर्म और विकर्म की गहरी व्याख्या करते हैं। जो व्यक्ति कर्म करते हुए भी अकर्मा है (फल और आसक्ति से रहित) वह ज्ञानी है। जो अकर्म में भी कर्म देखता है वह सच्चा ज्ञाता है।
ज्ञान की महिमा: इस अध्याय में श्रीकृष्ण बताते हैं कि ज्ञान के समान पवित्र करने वाला इस संसार में और कुछ भी नहीं है। भक्ति और श्रद्धा से प्राप्त किया गया ज्ञान सभी पापों को जलाकर भस्म कर देता है, जिस प्रकार अग्नि सारी लकड़ियों को जला डालती है।
यज्ञ के विभिन्न प्रकार: अध्याय में द्रव्य यज्ञ, ज्ञान यज्ञ, अहिंसा यज्ञ, ज्योतिष्टोम यज्ञ आदि अनेक प्रकार के यज्ञों का वर्णन है। अंत में श्रीकृष्ण कहते हैं कि 'तस्माद् असंशयं शुभं, श्रद्धावान् लभते ज्ञानम्' — जिज्ञासु और श्रद्धालु व्यक्ति ज्ञान प्राप्त करता है।





