विस्तृत उत्तर
भगवद्गीता (८.१६) में भगवान श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि ब्रह्मलोक से लेकर भूलोक तक सभी लोक पुनरावर्ती हैं। इसलिए भुवर्लोक या सिद्धलोक में चाहे कितने भी दीर्घ काल का निवास हो वहाँ संचित पुण्यों या सिद्धियों के क्षीण होने पर जीव को पुनः भूलोक (पृथ्वी) पर जन्म लेना ही पड़ता है। गीता के चौदहवें अध्याय के अनुसार सत्व, रज और तम गुण आत्मा को बांधते हैं। भुवर्लोक के निवासी पूर्णतः सत्वगुणी नहीं होते बल्कि उनमें रजोगुण और तमोगुण की प्रधानता होती है। यह त्रिगुणात्मक बंधन उन्हें पुनः संसार की ओर खींचता है। मदालसा के उपदेशों में भी स्पष्ट कहा गया है कि भुवर्लोक सहित ये सभी लोक आत्मा के लिए अस्थायी पड़ाव मात्र हैं और अंतिम लक्ष्य मोक्ष ही होना चाहिए।
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