विस्तृत उत्तर
स्वर्लोक में निवास की अवधि पुण्य पर निर्भर करती है और यह अस्थायी होती है। जीव जितने अधिक पुण्य लेकर आता है उतने अधिक समय तक स्वर्ग का भोग कर सकता है। परंतु जब पुण्य समाप्त हो जाता है तो उसे वहाँ से लौटना ही पड़ता है। भगवद्गीता (9.21) में भगवान श्रीकृष्ण स्पष्ट कहते हैं — 'ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति' — अर्थात स्वर्लोक के विशाल सुखों को भोगने के पश्चात जब जीवात्मा का संचित पुण्य क्षीण हो जाता है तो उसे अनिवार्य रूप से पुनः मृत्युलोक पर लौटकर जन्म लेना पड़ता है। स्वर्लोक एक बैंक खाते के समान है जहाँ पुण्यों का संचय खर्च होता रहता है और पुण्य समाप्त होते ही जीव को वहाँ से निष्कासित कर दिया जाता है।
आगे क्या पढ़ें
प्रश्न से जुड़े हब और आज के उपयोगी पंचांग लिंक





