विस्तृत उत्तर
गीता के चौदहवें अध्याय के अनुसार सत्व, रज और तम गुण आत्मा को बांधते हैं। भुवर्लोक में रहने वाली आत्माओं और सत्ताओं की त्रिगुणात्मक स्थिति इस प्रकार है। ऊपरी भुवर्लोक के सिद्ध, चारण और विद्याधर — ये सात्त्विक और रजो-गुणी स्वभाव के होते हैं। उनमें सात्त्विक गुण है परंतु रजोगुण की भी प्रधानता है जो उन्हें सिद्धियों और गति की ओर खींचता है। यही रजोगुण उन्हें मोक्ष से रोकता है और अंततः पुनः पृथ्वी पर जन्म लेने के लिए बाध्य करता है। निचले भुवर्लोक के यक्ष, राक्षस, भूत और प्रेत तमोगुण प्रधान हैं। उनमें मोह, आसक्ति और अज्ञान की प्रधानता है। इस प्रकार भुवर्लोक के निवासी पूर्णतः सत्वगुणी नहीं होते और इसीलिए मोक्ष की बजाय पुनर्जन्म के चक्र में रहते हैं।
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