विस्तृत उत्तर
संजय को दिव्य दृष्टि महर्षि वेदव्यास ने प्रदान की थी। संजय धृतराष्ट्र के मंत्री और सारथी थे जो बुनकर कुल से थे — इसीलिए उन्हें 'सूतपुत्र' भी कहा जाता था।
जब कुरुक्षेत्र युद्ध आरंभ होने वाला था तब महर्षि वेदव्यास ने धृतराष्ट्र के पास आकर उन्हें प्रस्ताव दिया कि वे धृतराष्ट्र को भी दिव्य दृष्टि दे सकते हैं जिससे वे स्वयं युद्ध देख सकें। परंतु धृतराष्ट्र ने यह कहकर मना कर दिया कि वे अपने पुत्रों और स्वजनों को एक-दूसरे से लड़ते नहीं देखना चाहते। इस पर वेदव्यास ने संजय को दिव्य दृष्टि प्रदान की और कहा कि संजय समस्त युद्ध का वर्णन धृतराष्ट्र को सुनाएंगे।
इस दिव्य दृष्टि की विशेषता यह थी कि संजय न केवल दूर से घटनाएँ देख सकते थे, बल्कि योद्धाओं के मन की बात, रहस्यमय वार्तालाप और दिव्य घटनाएँ भी जान सकते थे। वेदव्यास ने यह भी वरदान दिया कि युद्ध के दौरान कोई अस्त्र-शस्त्र संजय को क्षति नहीं पहुँचाएगा।
श्रीमद्भगवद्गीता का प्रारंभ भी संजय-धृतराष्ट्र संवाद से होता है — 'धृतराष्ट्र उवाच: धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे...'। भगवान कृष्ण का विराट स्वरूप जो केवल अर्जुन को दिखाई दे रहा था, वह भी संजय ने अपनी दिव्य दृष्टि से देखा। युद्ध समाप्ति के बाद यह दिव्य दृष्टि नष्ट हो गई।




