विस्तृत उत्तर
विदुर महाभारत के सबसे विद्वान, न्यायनिष्ठ और नैतिक पात्रों में से एक हैं। उनका मूल नाम धर्मदेव था और उन्हें यमराज (धर्मराज) का अवतार माना जाता है।
जन्म की कथा यह है — महर्षि व्यास जी के माध्यम से नियोग प्रथा द्वारा धृतराष्ट्र और पांडु का जन्म हुआ था। अंबिका ने भय से आँखें बंद कर लीं जिससे धृतराष्ट्र अंधे जन्मे, अंबालिका पीली पड़ गईं जिससे पांडु रोगग्रस्त हुए। फिर अंबिका ने एक दासी को भेजा — जिसने प्रसन्नतापूर्वक व्यास जी का आतिथ्य किया — और उससे विदुर का जन्म हुआ।
माण्डव्य ऋषि के शाप के कारण धर्मराज (यमराज) को दासीपुत्र के रूप में मानव जन्म लेना पड़ा था। दासीपुत्र होने के कारण वे हस्तिनापुर की राजगद्दी नहीं पा सके, परंतु महामंत्री बने।
विदुर का जीवन सत्य और धर्म की अटूट प्रतिज्ञा का प्रतीक है। उन्होंने लाक्षागृह (लाख के घर) में पांडवों को जलाने की साजिश की सूचना गुप्त भाषा में युधिष्ठिर को दी और उनके प्राण बचाए। द्युत-सभा में द्रौपदी के अपमान का उन्होंने खुलकर विरोध किया। युद्ध को रोकने का हर प्रयास किया। उनकी विदुर नीति नीतिशास्त्र का एक अमूल्य ग्रंथ है जिसमें राज्य-नीति, आत्म-ज्ञान और धर्म का सुंदर संकलन है।
युद्ध के बाद उन्होंने वन में जाकर तपस्या की और अंत में अपने प्राण युधिष्ठिर में विलीन कर लिए।





