विस्तृत उत्तर
भीष्म पितामह कुरुक्षेत्र युद्ध के दसवें दिन अर्जुन के बाणों से छलनी हो गए और बाणों की शैया पर गिर पड़े, परंतु उनकी मृत्यु नहीं हुई। इसके पीछे उन्हें प्राप्त 'इच्छामृत्यु' का वरदान था।
यह वरदान उन्हें उनके पिता राजा शांतनु ने दिया था। जब भीष्म — जिनका बचपन का नाम देवव्रत था — ने अपने पिता की इच्छा पूरी करने के लिए आजीवन ब्रह्मचर्य और कभी राजा न बनने की भीषण प्रतिज्ञा ली, तब शांतनु अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने देवव्रत को वरदान दिया कि जब तक वे स्वयं न चाहें, उनकी मृत्यु नहीं होगी। इसी भीषण प्रतिज्ञा के कारण देवव्रत का नाम 'भीष्म' पड़ा और इच्छामृत्यु का वरदान उन्हें मिला।
कुरुक्षेत्र में बाणों की शैया पर पड़े रहने के बाद भी भीष्म ने तुरंत प्राण नहीं त्यागे। इसके पीछे एक गहरा कारण था — वे सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा कर रहे थे। शास्त्रों के अनुसार उत्तरायण काल में मृत्यु को प्राप्त होने वाले को मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह अत्यंत शुभ काल माना जाता है। उस समय सूर्य दक्षिणायन में थे जिसे शास्त्रों में अशुभ मृत्यु-काल माना गया है।
इस प्रकार भीष्म पितामह लगभग 58 दिनों तक बाणों की शैया पर घोर पीड़ा सहते हुए लेटे रहे। जब माघ माह के शुक्ल पक्ष में सूर्य मकर राशि में प्रवेश करके उत्तरायण हुए, तब भीष्म ने सभी को बुलाया, प्रेमपूर्वक उपदेश दिया और अपनी इच्छाशक्ति से प्राण त्याग दिए।





