विस्तृत उत्तर
द्युत में हारने के बाद पांडवों को बारह वर्ष का वनवास और एक वर्ष का अज्ञातवास करना था। अज्ञातवास की शर्त यह थी कि यदि इस एक वर्ष में उनकी पहचान हो गई तो उन्हें फिर से वनवास भोगना पड़ेगा।
बारह वर्ष वन में बिताने के बाद पांडव मत्स्य देश की राजधानी विराटनगर (आधुनिक राजस्थान में बैराठ के निकट) पहुँचे। उन्होंने पहले शमी वृक्ष पर अपने अस्त्र-शस्त्र छिपाए और फिर भिन्न-भिन्न वेश धारण करके राजा विराट के यहाँ रहे।
पाँचों पांडव और द्रौपदी ने अलग-अलग छद्मवेश अपनाए — युधिष्ठिर ने ब्राह्मण 'कंक' के रूप में राजा के सभासद बनकर चौसर खेला, भीम ने 'बल्लव' नाम से रसोइया का काम किया, अर्जुन ने 'बृहन्नला' नाम से नृत्य-संगीत शिक्षक का वेश धारण किया, नकुल ने 'ग्रन्थिक' के रूप में अश्व-पालक का काम किया, और सहदेव ने 'तन्तिपाल' नाम से गोपालक बने। द्रौपदी ने 'सैरन्ध्री' के रूप में रानी सुदेष्णा की केश-परिचारिका बनकर रहीं।
कीचक ने द्रौपदी का अपमान किया तो भीम ने उसका वध किया। युद्ध के तेरहवें वर्ष के अंत में दुर्योधन ने विराटनगर की गायें हरण कीं जिससे अर्जुन को बृहन्नला वेश में ही युद्ध करना पड़ा और उनकी पहचान हो गई — परंतु तब तक तेरह वर्ष पूरे हो चुके थे। इस प्रकार पांडवों का अज्ञातवास विराट नगर में सफलतापूर्वक संपन्न हुआ।





