विस्तृत उत्तर
कुंती का कर्ण को नदी में बहा देना महाभारत की सबसे हृदय-विदारक घटनाओं में से एक है। इसके पीछे कोई क्रूरता नहीं थी, बल्कि एक माँ की विवशता, भय और उस युग की सामाजिक मर्यादाओं का दबाव था।
कुंती जब युवती थीं और राजा कुंतिभोज के यहाँ रहती थीं, तब उन्होंने ऋषि दुर्वासा की वर्षभर सेवा की। प्रसन्न होकर दुर्वासा ने उन्हें एक मंत्र दिया — जिस देवता का आह्वान करें उनसे पुत्र प्राप्त कर सकती हैं। जिज्ञासावश कुंती ने उस मंत्र की परीक्षा के लिए सूर्यदेव का आह्वान कर लिया। सूर्य प्रकट हुए और उनके तेज से कुंती के गर्भ से एक दिव्य पुत्र का जन्म हुआ जो जन्म से ही कवच-कुंडल धारण किए था — यही कर्ण था।
परंतु उस समय कुंती अविवाहित और किशोरी थीं। अविवाहित स्त्री के गर्भ से पुत्र का जन्म उस युग में घोर सामाजिक अपमान और परिवार के लिए कलंक माना जाता था। परिवार को क्या उत्तर दें, समाज में नाक कटेगी — इस भय और लोक-लज्जा ने कुंती को विवश कर दिया। भारी मन और आँसुओं के साथ उन्होंने उस नवजात शिशु को एक बक्से में रखकर नदी में प्रवाहित कर दिया।
वह बक्सा नदी के साथ बहता हुआ हस्तिनापुर के सारथी अधिरथ के पास पहुँचा। उनकी पत्नी राधा ने उस शिशु को अपना पुत्र बना लिया। यही कर्ण 'राधेय' कहलाए। जीवनभर कुंती इस ग्लानि को जीती रहीं और युद्ध से पहले जब उन्होंने कर्ण को सच्चाई बताई, तब वह क्षण दोनों के लिए अत्यंत पीड़ादायक था।
