विस्तृत उत्तर
कुरुक्षेत्र का महाभारत युद्ध लगातार 18 दिनों तक चला। यह युद्ध मार्गशीर्ष माह के शुक्ल पक्ष में प्रारंभ हुआ और अठारहवें दिन दुर्योधन की मृत्यु के साथ समाप्त हुआ।
युद्ध के पहले 10 दिन भीष्म पितामह कौरवों के सेनापति थे और उनके अजेय रणकौशल से पांडव अत्यंत व्यथित थे। दसवें दिन अर्जुन ने शिखंडी को ढाल बनाकर भीष्म पर बाण वर्षा की और वे बाणों की शैया पर आ गए। 11वें से 15वें दिन तक द्रोणाचार्य सेनापति रहे। 15वें दिन 'अश्वत्थामा हतः' की छलपूर्ण घोषणा से द्रोण ने समाधि ले ली और धृष्टद्युम्न ने उनका वध किया। 16वें और 17वें दिन कर्ण सेनापति थे। 17वें दिन अर्जुन ने कर्ण का वध किया। 18वें दिन शल्य सेनापति बने और भीम ने दुर्योधन की जंघा तोड़ दी जिससे उनकी मृत्यु हुई। उसी रात अश्वत्थामा ने पांडव शिविर पर छापा मारा।
इस युद्ध में 18 अक्षौहिणी सेनाएँ थीं — कौरवों की ओर से 11 और पांडवों की ओर से 7। अरबों सैनिक मारे गए। केवल 18 योद्धा जीवित बचे। इस युद्ध के साथ ही द्वापर युग का अंत और कलियुग का आरंभ हुआ।
महाभारत इसे 'धर्मयुद्ध' कहता है क्योंकि यह सत्य और न्याय की स्थापना के लिए लड़ा गया था। इसी युद्ध की पृष्ठभूमि में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता का अमर संदेश दिया।





