विस्तृत उत्तर
वेदान्त दर्शन के अनुसार देवयान मार्ग में जो जीव सत्यलोक की यात्रा करता है उसे कई लोकों से गुजरना पड़ता है। सर्वप्रथम अर्चिस (प्रकाश या अग्नि) के देवता के लोक में जाती है, वहाँ से दिन के देवता, फिर शुक्ल पक्ष के देवता, और फिर सूर्य के उत्तरायण के छः महीनों के अधिष्ठाता देवताओं के लोक में पहुँचती है। इसके पश्चात वह आत्मा देवलोक, वायु लोक, वरुण लोक, इन्द्र लोक और प्रजापति के लोकों को पार करते हुए आदित्य (सूर्य) और अंततः विद्युत (बिजली) के लोक में पहुँचती है। विद्युत लोक में पहुँचने पर एक अमानव पुरुष (अतीन्द्रिय पुरुष) उस आत्मा को सत्यलोक (ब्रह्मलोक) तक ले जाता है।
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