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हिंदू दर्शन📜 भगवद्गीता 4.7-82 मिनट पठन

यदा यदा हि धर्मस्य श्लोक का अर्थ क्या है

संक्षिप्त उत्तर

गीता 4.7-8 — जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब भगवान प्रकट होते हैं — सज्जनों की रक्षा, दुष्टों के विनाश और धर्म स्थापना के लिए — प्रत्येक युग में। यह अवतारवाद का मूल सिद्धांत और शाश्वत आश्वासन है।

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विस्तृत उत्तर

यह भगवद्गीता का सबसे प्रसिद्ध और सर्वाधिक उद्धृत श्लोक है। यह अध्याय 4 (ज्ञान कर्म संन्यास योग) के श्लोक 7-8 हैं।

मूल श्लोक

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।

अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।। (4.7)

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।

धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे।। (4.8)'

शब्दार्थ

  • यदा यदा = जब-जब
  • धर्मस्य ग्लानिः = धर्म की हानि/क्षीणता
  • भवति = होती है
  • अभ्युत्थानम् = बढ़ना/उत्थान
  • अधर्मस्य = अधर्म का
  • तदा = तब
  • आत्मानं सृजामि = स्वयं को प्रकट करता हूं
  • परित्राणाय = रक्षा के लिए
  • साधूनाम् = सज्जनों/भक्तों की
  • विनाशाय = विनाश के लिए
  • दुष्कृताम् = दुष्टों/पापियों का
  • धर्मसंस्थापनार्थाय = धर्म की स्थापना के लिए
  • सम्भवामि = प्रकट होता हूं
  • युगे युगे = प्रत्येक युग में

भावार्थ

जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं (भगवान) स्वयं प्रकट होता हूं — सज्जनों की रक्षा, दुष्टों के विनाश और धर्म की स्थापना के लिए — प्रत्येक युग में।

गहन अर्थ

  1. 1अवतार सिद्धांत — यह हिंदू धर्म के अवतारवाद का मूल श्लोक है। भगवान आवश्यकता अनुसार अवतार लेते हैं।
  1. 1तीन उद्देश्य:
  • साधुओं/भक्तों की रक्षा
  • दुष्टों/अधर्मियों का विनाश
  • धर्म (विश्व व्यवस्था) की पुनःस्थापना
  1. 1'युगे युगे' — यह प्रक्रिया एकबारगी नहीं, शाश्वत है। जब-जब आवश्यकता होगी, भगवान प्रकट होंगे।
  1. 1दशावतार — मत्स्य, कूर्म, वराह, नरसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध (कुछ परंपराओं में), कल्कि — ये इसी सिद्धांत के उदाहरण हैं।

आधुनिक प्रेरणा: यह श्लोक आश्वासन देता है कि अधर्म कितना भी प्रबल हो, अंततः धर्म की विजय होगी।

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शास्त्रीय स्रोत
भगवद्गीता 4.7-8
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