विस्तृत उत्तर
यह भगवद्गीता का सबसे प्रसिद्ध और सर्वाधिक उद्धृत श्लोक है। यह अध्याय 4 (ज्ञान कर्म संन्यास योग) के श्लोक 7-8 हैं।
मूल श्लोक
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।। (4.7)
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे।। (4.8)'
शब्दार्थ
- ▸यदा यदा = जब-जब
- ▸धर्मस्य ग्लानिः = धर्म की हानि/क्षीणता
- ▸भवति = होती है
- ▸अभ्युत्थानम् = बढ़ना/उत्थान
- ▸अधर्मस्य = अधर्म का
- ▸तदा = तब
- ▸आत्मानं सृजामि = स्वयं को प्रकट करता हूं
- ▸परित्राणाय = रक्षा के लिए
- ▸साधूनाम् = सज्जनों/भक्तों की
- ▸विनाशाय = विनाश के लिए
- ▸दुष्कृताम् = दुष्टों/पापियों का
- ▸धर्मसंस्थापनार्थाय = धर्म की स्थापना के लिए
- ▸सम्भवामि = प्रकट होता हूं
- ▸युगे युगे = प्रत्येक युग में
भावार्थ
जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं (भगवान) स्वयं प्रकट होता हूं — सज्जनों की रक्षा, दुष्टों के विनाश और धर्म की स्थापना के लिए — प्रत्येक युग में।
गहन अर्थ
- 1अवतार सिद्धांत — यह हिंदू धर्म के अवतारवाद का मूल श्लोक है। भगवान आवश्यकता अनुसार अवतार लेते हैं।
- 1तीन उद्देश्य:
- ▸साधुओं/भक्तों की रक्षा
- ▸दुष्टों/अधर्मियों का विनाश
- ▸धर्म (विश्व व्यवस्था) की पुनःस्थापना
- 1'युगे युगे' — यह प्रक्रिया एकबारगी नहीं, शाश्वत है। जब-जब आवश्यकता होगी, भगवान प्रकट होंगे।
- 1दशावतार — मत्स्य, कूर्म, वराह, नरसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध (कुछ परंपराओं में), कल्कि — ये इसी सिद्धांत के उदाहरण हैं।
आधुनिक प्रेरणा: यह श्लोक आश्वासन देता है कि अधर्म कितना भी प्रबल हो, अंततः धर्म की विजय होगी।





