विस्तृत उत्तर
हाँ, संन्यास लिए बिना मोक्ष पूर्णतः संभव है। गीता में कृष्ण ने यह स्पष्ट किया है।
गीता 5.2-6
संन्यास (कर्म त्याग) और कर्म योग (निष्काम कर्म) दोनों मोक्षदायक हैं, परंतु 'कर्मयोगो विशिष्यते' — कर्म योग श्रेष्ठ है। बिना कर्म योग के शुद्ध संन्यास कठिन है।
गीता 18.49
असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः। नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छति।।
— सर्वत्र आसक्तिरहित, जितात्मा, इच्छारहित व्यक्ति संन्यास (आंतरिक त्याग) से परम सिद्धि प्राप्त करता है। यहां संन्यास = बाह्य गेरुआ वस्त्र नहीं, बल्कि आसक्ति का आंतरिक त्याग।
प्रमाण — बिना संन्यास मोक्ष पाने वाले
- ▸राजा जनक — गृहस्थ, राजा, जीवनमुक्त।
- ▸यम (धर्मराज) — गृहस्थ, न्यायाधीश।
- ▸विदुर — गृहस्थ, महाभारत के ज्ञानी।
- ▸गोपियां — साधारण गोपालक स्त्रियां, परम भक्ति।
- ▸द्रौपदी — गृहस्थ, कृष्ण भक्ता।
दो प्रकार का संन्यास
- 1बाह्य संन्यास — गेरुआ वस्त्र, संसार त्याग, आश्रम — विधिवत संन्यास।
- 2आंतरिक संन्यास — आसक्ति, अहंकार, कामना का त्याग — गृहस्थ रहकर भी संभव।
गीता का संदेश: आंतरिक संन्यास (वैराग्य) = बाह्य संन्यास से अधिक महत्वपूर्ण। बाहर से गेरुआ पहनकर भीतर से आसक्त = ढोंग। बाहर से गृहस्थ परंतु भीतर से विरक्त = सच्चा योगी।





