विस्तृत उत्तर
श्रीमद् भगवद गीता का पाँचवाँ अध्याय 'कर्मसंन्यासयोग' कहलाता है और इसमें 29 श्लोक हैं।
अर्जुन का प्रश्न: अर्जुन पूछते हैं — 'आप कर्म संन्यास (कर्मों का त्याग) की प्रशंसा करते हैं और फिर कर्मयोग की भी। इन दोनों में से कौन-सा मेरे लिए श्रेयस्कर है?'
श्रीकृष्ण का उत्तर: श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि कर्म संन्यास और कर्मयोग दोनों ही परम कल्याणकारी हैं। लेकिन कर्मयोग कर्म संन्यास से श्रेष्ठ है क्योंकि यह सबके लिए सुलभ और व्यावहारिक है। मन की शुद्धि बिना भक्ति युक्त कर्म किए संभव नहीं है, और मन शुद्ध हुए बिना कर्म का सच्चा संन्यास नहीं हो सकता।
सच्चे संन्यासी की पहचान: जो व्यक्ति न किसी से द्वेष करता है और न किसी की आकांक्षा रखता है, वह सदा संन्यासी ही है। राग और द्वेष से मुक्त व्यक्ति सभी प्रकार के बंधनों से सुखपूर्वक मुक्त हो जाता है।
कर्म में अकर्तापन का भाव: कर्मयोगी जब देखते, सुनते, चलते, सोते या बोलते हैं, तब वे मानते हैं कि 'मैं कर्ता नहीं हूँ, केवल इन्द्रियाँ अपने विषयों में क्रियाशील हैं।' यह भाव उन्हें कर्म के बंधन से मुक्त रखता है।
ब्रह्म का अनुभव: अध्याय के उत्तरार्ध में श्रीकृष्ण ब्रह्म की स्थिति का वर्णन करते हैं। ब्रह्मनिष्ठ व्यक्ति संसार के सुख-दुख से अप्रभावित रहता है। ऐसा व्यक्ति अपने भीतर ही आनंद, प्रकाश और शांति पाता है और वह जीते जी मुक्त (ब्रह्मभूत) होता है।




