का सरल उत्तर
पाँचवें अध्याय का मूल संदेश: कर्मयोग कर्म संन्यास से सुलभ और श्रेष्ठ है। अकर्तापन के भाव से कर्म करो। राग-द्वेष से मुक्त होना ही सच्चा संन्यास है।
मूल प्रश्न का सम्पूर्ण शास्त्रीय उत्तर एक स्थान पर।
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