विस्तृत उत्तर
हिंदू दर्शन में कर्मयोग का चरम बिंदु यह है कि कर्म का कर्ता भाव ईश्वर को सौंप दिया जाए।
यजमान अपनी अंजलि (दाहिने हाथ) में जल लेकर अनुष्ठान का संपूर्ण पुण्य भगवान शिव के श्रीचरणों में समर्पित कर देता है:
'ॐ अनेन अद्य दिवसे पूजन कर्मणा श्री परमेश्वर प्रियताम न मम'
न मम' का शाब्दिक अर्थ है 'यह मेरा नहीं है।' यानी आज के दिन किए गए इस पूजन कर्म से परमेश्वर शिव प्रसन्न हों, यह सब उनका है, मेरा इस पर कोई अधिकार नहीं है।
यह अहंकार का पूर्ण शमन और कर्मयोग की सर्वोच्च अवस्था है।


