विस्तृत उत्तर
नमः' शब्द का व्युत्पत्ति संबंधी विच्छेदन करने पर इसका गूढ़ अर्थ प्रकट होता है: न + मम। इसका शाब्दिक अर्थ है 'मेरा नहीं'।
इस व्याख्या के अनुसार, 'नमः' का उच्चारण केवल एक विनम्र अभिवादन नहीं है, बल्कि यह अहंकार के विसर्जन का एक शक्तिशाली आध्यात्मिक कार्य है।
यह 'मैं' और 'मेरे' की भावना का सचेत त्याग है, जो सभी दुखों और बंधनों का मूल है। जब एक साधक 'नमः' कहता है, तो वह प्रतीकात्मक रूप से अपने व्यक्तिगत अहंकार, अपनी इच्छाओं और अपनी पहचान को उस दिव्य चेतना के समक्ष समर्पित कर रहा होता है जिसकी वह पूजा कर रहा है।





