विस्तृत उत्तर
यह गूढ़ अर्थ भैरव साधना के संदर्भ में विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है। जैसा कि हमने देखा, भैरव का प्राकट्य ही ब्रह्मा के अहंकार को नष्ट करने के लिए हुआ था। भैरव की मूल ऊर्जा अहंकार-विनाशक है।
इसलिए, जब एक साधक भैरव मंत्र का जाप 'नमः' के साथ शुरू करता है, तो वह केवल एक औपचारिकता पूरी नहीं कर रहा होता। वह एक गहन संरेखण का कार्य कर रहा होता है।
न मम' ('मेरा नहीं') कहकर, साधक स्वेच्छा से अपने स्वयं के अहंकार को विसर्जित करता है, ठीक उसी तरह जैसे भैरव ने ब्रह्मा के अहंकार को विसर्जित किया था। यह साधक को भैरव की प्रचंड ऊर्जा को ग्रहण करने के लिए एक शुद्ध और योग्य पात्र बनाता है। यह उस प्राथमिक बाधा (साधक का अपना अहंकार) को हटा देता है जिसे नष्ट करने के लिए भैरव का अस्तित्व है।
इस प्रकार, 'नमः' का जाप भैरव साधना में प्रवेश करने का पहला और सबसे महत्वपूर्ण कदम है — यह समर्पण के माध्यम से शुद्धि की प्रक्रिया है, जो साधक को उस दिव्य शक्ति के साथ जोड़ती है जिसका वह आह्वान कर रहा है।





