विस्तृत उत्तर
वेद और आगम शास्त्र यह मानते हैं कि कोई भी भौतिक कर्मकांड मनुष्य द्वारा पूर्णतया त्रुटिहीन नहीं हो सकता। उच्चारण में दोष, द्रव्यों में कमी अथवा मन के भटकाव की संभावना सदैव रहती है। अतः अनुष्ठान के अंत में क्षमा-प्रार्थना अत्यंत अनिवार्य है।
क्षमा प्रार्थना मंत्र:
करचरणकृतं वाक् कायजं कर्मजं वा श्रवणनयनजं वा मानसंवापराधं। विहितं विहितं वा सर्वमेतत् क्षमस्व जय जय करुणाब्धे श्री महादेव शम्भो॥
अर्थ: हे करुणा के अगाध सागर श्री महादेव! मेरे हाथों, पैरों, वाणी, शरीर, कर्म, कान, आंख या मन से जो भी ज्ञात-अज्ञात अपराध या त्रुटि हुई हो — उस सबको क्षमा करें।





