विस्तृत उत्तर
सनातन कर्मकांड में कोई भी पूजा, जप या अनुष्ठान तब तक पूर्ण नहीं माना जाता जब तक उसके अंत में 'क्षमा प्रार्थना' न की जाए। इसका आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक दोनों महत्व है।
जप के दौरान अनजाने में मंत्र के उच्चारण (ह्रस्व-दीर्घ), ध्यान, आसन, या न्यास में कोई न कोई त्रुटि अवश्य हो जाती है। क्षमा प्रार्थना ('आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्... क्षमस्व परमेश्वर') के माध्यम से साधक ईश्वर के सामने यह स्वीकार करता है कि वह अज्ञानी है और पूजा की पूर्ण विधि नहीं जानता। यह साधक के 'अहंकार' (कि मैंने बहुत बड़ा अनुष्ठान किया है) को नष्ट कर देता है। भगवान भाव के भूखे हैं; क्षमा मांगने से अनुष्ठान की सभी कमियां माफ हो जाती हैं और वह त्रुटिपूर्ण पूजा भी भगवान द्वारा सहर्ष स्वीकार कर ली जाती है।





