विस्तृत उत्तर
माता छिन्नमस्ता दस महाविद्याओं में छठी विद्या हैं। उनका स्वरूप अत्यंत रहस्यमयी और भयानक है—उन्होंने अपना ही मस्तक काट रखा है और अपनी गर्दन से निकल रही रक्त की धाराएं स्वयं और अपनी दो सहचरियों (डाकिनी और वर्णिनी) को पिला रही हैं। यह स्वरूप सांसारिक अहंकार (Ego) के पूर्ण विनाश और सर्वोच्च बलिदान का प्रतीक है।
छिन्नमस्ता का मंत्र 'ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं वज्रवैरोचनीये हूं हूं फट् स्वाहा' है। इस मंत्र की शक्ति अत्यंत उग्र होती है जो साधक के मन से मृत्यु का भय, कामुकता और झूठे अहंकार को क्षण भर में काट देती है। यह कुण्डलिनी शक्ति को सहस्रार चक्र तक ले जाने की तीव्रतम साधना है। रहस्य यह है कि यह साधना कभी भी सामान्य गृहस्थ को बिना सक्षम गुरु के नहीं करनी चाहिए, क्योंकि इसकी ऊर्जा को संभालना अत्यंत कठिन होता है।