विस्तृत उत्तर
माता धूमावती दस महाविद्याओं में सातवीं विद्या हैं। उन्हें 'अलक्ष्मी' या ज्येष्ठा भी कहा जाता है। उनका स्वरूप एक अत्यंत वृद्ध, भूखी, विधवा स्त्री का है जो कौए वाले रथ पर सवार हैं। यह महाविद्या जीवन के अभाव, दुःख, रोग और श्मशान की ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करती हैं।
धूमावती साधना सामान्यतः वैराग्य प्राप्त करने वाले संन्यासियों, अघोरियों या तांत्रिकों द्वारा की जाती है। इस मंत्र का जप हमेशा मध्यरात्रि के बाद (विशेषकर अमावस्या की रात) किया जाता है। साधना का स्थान एकांत, श्मशान या कोई निर्जन खंडहर होना चाहिए। सामान्य गृहस्थों के लिए धूमावती मंत्र का जप या उनकी मूर्ति घर में रखना वर्जित है, क्योंकि यह घर में अभाव और अलक्ष्मी को आमंत्रित कर सकता है। केवल घोर शत्रु नाश या गंभीर तांत्रिक मारण प्रयोगों के लिए गुरु इसे निर्देशित करते हैं।