विस्तृत उत्तर
भगवान काल भैरव शिव के अत्यंत उग्र और शीघ्र फलदायी स्वरूप हैं। उनकी साधना तांत्रिक और अघोर मार्ग में प्रमुखता से की जाती है। भैरव मंत्रों के जप में अत्यंत सावधानी की आवश्यकता होती है, क्योंकि थोड़ी सी भी चूक नुकसान पहुंचा सकती है।
सबसे पहली सावधानी यह है कि बिना योग्य गुरु के मार्गदर्शन के भैरव के उग्र मंत्रों (जैसे स्वर्णाकर्षण भैरव को छोड़कर अन्य तामसिक स्वरूप) का जप नहीं करना चाहिए। साधना काल में पूर्ण ब्रह्मचर्य, मांस-मदिरा का त्याग (जब तक कि वह वाम मार्गी अनुष्ठान का हिस्सा न हो), और विचारों की पवित्रता अनिवार्य है। भैरव साधना हमेशा रात्रि (विशेषकर निशीथ काल) में की जाती है। यदि जप के दौरान कोई डरावना अनुभव हो, तो घबराना नहीं चाहिए और साधना बीच में नहीं छोड़नी चाहिए। सामान्य गृहस्थों को 'ॐ बटुक भैरवाय नमः' का सात्विक जप ही करना चाहिए।

