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हिंदू दर्शन📜 पतंजलि योगसूत्र (2.30-31)3 मिनट पठन

सत्य अहिंसा अस्तेय ब्रह्मचर्य अपरिग्रह पांच यम

संक्षिप्त उत्तर

योगसूत्र 2.30 — पांच यम (महाव्रत, सार्वभौमिक): अहिंसा (सर्व प्राणी दया), सत्य (मन-वचन-कर्म एकरूपता), अस्तेय (चोरी/लालसा न), ब्रह्मचर्य (ऊर्जा संयम/ईश्वर-चिंतन), अपरिग्रह (अत्यधिक संग्रह न)। अहिंसा सबसे पहले = सर्वोच्च। जाति/देश/काल से परे — सभी मनुष्यों के लिए।

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विस्तृत उत्तर

पांच यम पतंजलि के योगसूत्र (2.30) में वर्णित सामाजिक नैतिकता के मूल नियम हैं। ये अष्टांग योग का प्रथम अंग हैं। योगसूत्र 2.31 इन्हें 'महाव्रत' (Great Vows) कहता है — 'जातिदेशकालसमयानवच्छिन्नाः सार्वभौमा महाव्रतम्' — ये जाति, देश, काल और परिस्थिति से अप्रभावित, सार्वभौमिक महाव्रत हैं।

1अहिंसा (Non-violence)

  • अर्थ — किसी भी प्राणी को मन, वचन, कर्म से हिंसा न करना। शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक — सभी प्रकार की हिंसा वर्जित।
  • गहन अर्थ — केवल 'न मारना' नहीं, बल्कि सभी प्राणियों के प्रति दया, करुणा और सम्मान।
  • पतंजलि (2.35) — अहिंसा प्रतिष्ठित व्यक्ति की उपस्थिति में सभी प्राणियों की वैरभावना समाप्त हो जाती है।
  • गांधी — अहिंसा को राजनीतिक शक्ति बनाया।

2सत्य (Truthfulness)

  • अर्थ — सत्य बोलना, सत्य आचरण। मन-वचन-कर्म में एकरूपता।
  • गहन अर्थ — केवल झूठ न बोलना नहीं, बल्कि यथार्थ को जैसा है वैसा स्वीकार करना। स्वयं से भी सत्य।
  • सावधानी — यदि सत्य बोलने से किसी को हिंसा हो, तो अहिंसा प्राथमिक (यही कारण है कि अहिंसा पहले आती है)।
  • पतंजलि (2.36) — सत्य प्रतिष्ठित व्यक्ति की वाणी फलित होती है — जो कहे वह सत्य होता है।

3अस्तेय (Non-stealing)

  • अर्थ — चोरी न करना — भौतिक वस्तु, बौद्धिक संपदा, समय, श्रेय — कुछ भी।
  • गहन अर्थ — दूसरों की वस्तुओं की इच्छा/लालसा भी अस्तेय भंग है।
  • पतंजलि (2.37) — अस्तेय प्रतिष्ठित व्यक्ति के पास सब रत्न स्वयं आते हैं।

4ब्रह्मचर्य (Celibacy/Energy management)

  • अर्थ — संकुचित: यौन संयम, शारीरिक इंद्रिय नियंत्रण। व्यापक: ब्रह्म (ईश्वर/सत्य) में चरण (विचरण) = ब्रह्मचर्य — ईश्वर-चिंतन में स्थिति।
  • गहन अर्थ — यौन ऊर्जा का संरक्षण और उसका आध्यात्मिक/रचनात्मक उपयोग। गृहस्थ में संयमित दांपत्य।
  • पतंजलि (2.38) — ब्रह्मचर्य प्रतिष्ठित व्यक्ति को वीर्य (ऊर्जा/शक्ति) प्राप्त होती है।

5अपरिग्रह (Non-possessiveness)

  • अर्थ — आवश्यकता से अधिक संग्रह न करना। भौतिक वस्तुओं का अत्यधिक संचय वर्जित।
  • गहन अर्थ — केवल भौतिक नहीं, मानसिक संग्रह (विचारों, भावनाओं, पहचान) का भी त्याग। उपभोग करो, जमा मत करो।
  • पतंजलि (2.39) — अपरिग्रह स्थिर होने पर जन्मांतर ज्ञान (पूर्वजन्मों का ज्ञान) प्राप्त होता है।

महाव्रत (2.31)

ये पांच यम सार्वभौमिक हैं — किसी भी देश, काल, परिस्थिति, जाति, वर्ग में लागू। ये केवल योगी के लिए नहीं, प्रत्येक मनुष्य के लिए हैं।

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शास्त्रीय स्रोत
पतंजलि योगसूत्र (2.30-31)
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