ॐ नमः शिवाय  |  जय श्री राम  |  हरे कृष्ण
दुर्गा पूजा विधि: बंगाल की पांच-दिवसीय पारंपरिक दुर्गा पूजा की शास्त्रसम्मत विधि
Puja Vidhi

दुर्गा पूजा विधि: बंगाल की पांच-दिवसीय पारंपरिक दुर्गा

📿 पौराणिक•26 मिनट पढ़ें
अंतिम अपडेट: 27 मार्च 2026
तुरंत उत्तर

दुर्गा पूजा (दुर्गोत्सव) की शास्त्रसम्मत विधि — बंगाल परंपरा में पांच-दिवसीय पूजन, बोधन, आधिवास, संधि पूजा एवं विजयादशमी सिन्दूर खेला।

ज्ञान-सार

अगर पूरा पोस्ट नहीं पढ़ना चाहते, तो यह सारांश पढ़ें — इससे आपको सटीक जानकारी मिलेगी।

क्लिक करते ही लेख के सबसे महत्वपूर्ण बिंदु एक साफ, छोटे और भरोसेमंद सार में दिखेंगे।

WhatsApp

दुर्गा पूजा (दुर्गोत्सव): बंगाल की पांच-दिवसीय पारंपरिक दुर्गा पूजा की शास्त्रसम्मत एवं अनुष्ठानिक विधि पर विशद शोध

प्रस्तावना तथा ऐतिहासिक एवं शास्त्रीय पीठिका

बंगाल में शारदीय दुर्गोत्सव मात्र एक वार्षिक धार्मिक उत्सव नहीं है, अपितु यह शाक्त परंपरा, तान्त्रिक दर्शन, कृषि-संस्कृति, और ब्रह्मांडीय ऊर्जा के ऊर्ध्वगमन का एक अत्यंत जटिल, परिष्कृत एवं व्यवस्थित अनुष्ठानिक समुच्चय है । इस पांच-दिवसीय (षष्ठी से दशमी) पूजन विधान का सबसे प्रामाणिक, तार्किक और व्यवस्थित स्वरूप सोलहवीं शताब्दी के महान स्मार्त विद्वान रघुनंदन भट्टाचार्य (1520–1575 ई.) कृत 'दुर्गोत्सव तत्त्व' (Durgapujatattva) में प्राप्त होता है । रघुनंदन का यह ग्रंथ बंगाल की दुर्गा पूजा के लिए एक आधारभूत 'अनुष्ठानिक ब्लूप्रिंट' (Ritual Blueprint) है, जिसने एक ओर तान्त्रिक शक्ति-साधना (जिसमें बलि आदि का कड़ा विधान है) और दूसरी ओर रूढ़िवादी ब्राह्मणवादी स्मार्त परंपरा के मध्य एक अत्यंत तार्किक और शास्त्रसम्मत संतुलन स्थापित किया । ऐतिहासिक दृष्टि से बंगाल में देवों की अपेक्षा देवियों को सर्वोच्च स्थान प्राप्त रहा है, और चौदहवीं से सोलहवीं शताब्दी के मध्य विकसित हुई यह पूजन पद्धति स्थानीय जमींदारों एवं कुलीन ब्राह्मणों द्वारा समर्थित थी, जो इसके माध्यम से अपनी सामाजिक स्थिति, धर्मनिष्ठा और कृषि-समृद्धि का प्रदर्शन करते थे ।

दुर्गोत्सव मूलतः प्रकृति के पुनरुद्धार, मातृ-शक्ति के जागरण और मानव चेतना के उच्चतम शिखर तक पहुंचने का एक क्रमिक अनुष्ठान है। यह शोध-पत्र मुख्य रूप से मार्कण्डेय पुराण के अंश 'दुर्गा सप्तशती' (देवी माहात्म्य), कालिका पुराण, देवी भागवत, तथा रघुनंदन के 'दुर्गोत्सव तत्त्व' के आधार पर षष्ठी से दशमी तक चलने वाले प्रत्येक अनुष्ठान का सूक्ष्म, तार्किक एवं प्रामाणिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इसमें संकल्प, देवी आवाहन, नवपत्रिका स्थापन, प्राण-प्रतिष्ठा, कुमारी पूजन, संधिक्षण पूजा, बलि-प्रथा का शास्त्रीय संदर्भ, और विसर्जन विधान को उनकी संपूर्ण दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक गहराई के साथ व्याख्यायित किया गया है ।

व्रत-विधान, पात्रता, नियम एवं संकल्प का दार्शनिक आधार

शास्त्रीय दृष्टिकोण से दुर्गा पूजा एक 'काम्य' (किसी विशेष उद्देश्य की पूर्ति हेतु किया जाने वाला) और 'नित्य' (शास्त्रीय नियमानुसार अनिवार्य) दोनों प्रकार का कर्म है । अग्नि पुराण (अध्याय 175) और विभिन्न स्मार्त ग्रंथों के अनुसार, व्रत केवल शारीरिक उपवास अथवा भूखे रहने का नाम नहीं है, बल्कि यह 'नियम' और 'तप' का एक समेकित स्वरूप है, जिसमें इंद्रिय निग्रह (दम) और मनो-निग्रह (शम) अनिवार्य माने गए हैं । व्रत शब्द संस्कृत की 'वृ' धातु से बना है, जिसका अर्थ है 'चुनना' या 'संकल्प लेना' ।

दुर्गोत्सव के व्रत में प्रवेश करने वाले वृती (संकल्पकर्ता या यजमान) के लिए कठोर नियमों का पालन अनिवार्य है। आहार के स्तर पर तामसिक भोजन जैसे मांस, मदिरा, प्याज और लहसुन का पूर्णतः निषेध किया गया है । सात्विक आहार ग्रहण करना चाहिए और पारंपरिक परिष्कृत नमक के स्थान पर सेंधा नमक का प्रयोग विहित है । आचरण के स्तर पर व्रत के दौरान भूमि पर शयन करना, पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करना और क्रोध, असत्य एवं लोभ जैसी प्रवृत्तियों का त्याग करना आवश्यक है । शारीरिक शुद्धि के संदर्भ में सूतक या अशौच की स्थिति में, अथवा महिलाओं के रजस्वला होने पर प्रत्यक्ष पूजन अथवा देव-स्पर्श वर्जित माना गया है, यद्यपि इस अवस्था में मानसिक जप निरंतर किया जा सकता है । यदि किसी कारणवश व्रत खंडित हो जाए, तो शास्त्रों में इसके लिए तीन दिन के प्रायश्चित उपवास और मुंडन आदि का विधान भी उल्लिखित है ।

बिना संकल्प के किया गया कोई भी वैदिक या तांत्रिक कर्म निष्फल माना जाता है। संकल्प वस्तुतः यजमान के मनोवैज्ञानिक और ब्रह्मांडीय स्थान (Cosmic Coordinates) को निर्धारित करने की एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है । संकल्प मंत्र के उच्चारण के साथ साधक ब्रह्मांड की अनंतता में अपने वर्तमान क्षण और अपने अभीष्ट को ब्रह्मांडीय चेतना के साथ जोड़ता है। पूर्ण संकल्प मंत्र की संरचना कुछ इस प्रकार होती है:

"ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः श्रीमद् भगवतो महापुरुष्य विष्णु राज्ञया प्रवर्तमानस्य... अद्य अमुक गोत्रः अमुक नामधेयोऽहं ममोपात्त समस्त दुरितक्षय द्वारा श्री दुर्गा देवी प्रीत्यर्थं... अस्मद सहकुटुम्बानाम क्षेम, धैर्य, आयुः, आरोग्य, ऐश्वर्य अभिवृद्ध्यर्थं... शत्रु पराजय सदाभीष्ट सिद्धयर्थे श्री दुर्गा पूजनं अहं करिष्ये"

इस मंत्र में देश (भूलोक, जम्बू द्वीप), काल (कल्प, युग, संवत्सर, मास, पक्ष, तिथि), यजमान की पहचान (गोत्र, नाम) और उद्देश्य (शत्रु नाश, आयु, धन, मोक्ष) का अत्यंत स्पष्ट उल्लेख होता है, जो मन को पूर्णतः एकाग्र कर अनुष्ठान के प्रति प्रतिबद्ध करता है ।

चंडी पाठ (दुर्गा सप्तशती) एवं जप-विधान का रहस्य

मार्कण्डेय पुराण के 01वें से13वें अध्याय तक फैले 700 श्लोकों के दिव्य संग्रह को 'दुर्गा सप्तशती', 'देवी माहात्म्य' या 'चंडी पाठ' कहा जाता है । दुर्गोत्सव में चंडी पाठ केवल कथा वाचन नहीं है, बल्कि यह देवी की ध्वन्यात्मक उपस्थिति (Sonic manifestation) है, जो अनुष्ठानिक स्थल को नकारात्मक ऊर्जा से मुक्त कर उसे पवित्र करती है । महर्षि वेदव्यास द्वारा संकलित यह ग्रंथ मूलतः शाक्त परंपरा का आधार है, जिसमें परम सत्ता (ब्रह्म) को आदि पराशक्ति के रूप में दर्शाया गया है । यह ग्रंथ मनुष्य के मन में चल रहे देवासुर संग्राम का एक अत्यंत सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक रूपक है。

शास्त्रों में चंडी पाठ की दो प्रमुख विधियां वर्णित हैं: त्रयंगम और नवांगम । त्रयंगम विधि में मूल पाठ से पूर्व केवल तीन स्तोत्रों का पाठ होता है— देवी कवच (शारीरिक और आध्यात्मिक सुरक्षा हेतु), अर्गला स्तोत्र (बाधाओं के निवारण और अभीष्ट सिद्धि हेतु), और कीलक स्तोत्र (मंत्रों को शापमुक्त कर जाग्रत करने हेतु) । इसके विपरीत, नवांगम विधि अत्यंत विस्तृत है और इसमें नौ चरण होते हैं— देवी न्यास, देवी आवाहन, देवी नामानि, अर्गला, कीलक, देवी हृदय, ढल, देवी ध्यान, और अंत में देवी कवच । न्यास की प्रक्रिया विशेष रूप से तांत्रिक है, जिसमें ब्रह्मांडीय ऊर्जा को मंत्रों के माध्यम से साधक के शरीर के विभिन्न अंगों में स्थापित किया जाता है। दुर्गा सप्तशती का पाठ ब्रह्मा, वशिष्ठ और विश्वामित्र द्वारा शापित माना जाता है, अतः इसके पूर्ण फल की प्राप्ति के लिए पाठ के आरंभ में 'शाप विमोचन मंत्र' का उच्चारण अत्यंत आवश्यक है ।

यद्यपि नवरात्रि के नौ दिनों में अध्याय-विभाजन भिन्न हो सकता है, परंतु बंगाल की पारंपरिक पांच-दिवसीय दुर्गा पूजा (षष्ठी से दशमी) में सप्तशती के 13 अध्यायों को एक विशिष्ट अनुक्रम में पढ़ा जाता है । यह विभाजन साधक की आध्यात्मिक यात्रा के क्रमिक विकास का द्योतक है:

अनुष्ठान का दिन अध्याय कथा प्रसंग एवं तात्विक अर्थ
महा-षष्ठी अध्याय 1 मधु-कैटभ वध: तमोगुण (अज्ञान और जड़ता) के नाश एवं चेतना के प्रथम जागरण का प्रतीक ।
महा-सप्तमी अध्याय 2, 3, 4 महिषासुर वध एवं शक्रादिक स्तुति: रजोगुण (अहंकार और अति-महत्वाकांक्षा) के शमन का प्रतीक ।
महा-अष्टमी अध्याय 5, 6, 7, 0 धूम्रलोचन, चंड-मुंड, और रक्तबीज वध: अनियंत्रित विचारों और वासनाओं (रक्तबीज) के समूल नाश का द्योतक ।
महा-नवमी अध्याय1, 10, 11 शुंभ-निशुंभ वध एवं नारायणी स्तुति: सत्वगुण की प्रधानता और अंतिम द्वैतभाव (Duality) की समाप्ति ।
विजया दशमी अध्याय 12, 13 फलश्रुति (महिमा का वर्णन), सुरथ और समाधि वैश्य को वरदान प्राप्ति तथा अपराध क्षमा प्रार्थना ।

इन अध्यायों के पाठ के साथ-साथ 'नवार्ण मंत्र' (ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे) का जप अनिवार्य है। यह नौ अक्षरों का मंत्र देवी की सर्वोच्च शक्ति को जाग्रत करता है और साधक के भीतर साहस, प्रज्ञा और दिव्य आशीर्वाद का संचार करता है ।

प्रथम दिन: महा-षष्ठी (कल्पारंभ, बोधन, आमंत्रण एवं अधिवास)

बंगाल में मुख्य दुर्गोत्सव का आरंभ आश्विन शुक्ल षष्ठी से होता है। यह दिन देवी को उनकी चिर निद्रा से जगाने, उन्हें भौतिक लोक में आमंत्रित करने और पूजा मंडप में उनके अधिवास का दिन है । हिंदू शास्त्रों के अनुसार, आश्विन मास में देवता निद्रा में होते हैं (दक्षिणायन को देवताओं की रात्रि कहा जाता है)। इसलिए भगवान राम ने रावण वध हेतु देवी का असमय (अकाल) जागरण किया था, जिसे 'अकाल बोधन' कहा जाता है ।

रघुनंदन के 'दुर्गोत्सव तत्त्व' के अनुसार बोधन की प्रक्रिया संध्या के समय एक परिपक्व बिल्व (बेल) वृक्ष के नीचे संपन्न की जाती है । बिल्व वृक्ष भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है और इसे साक्षात् शिव का स्वरूप माना जाता है। पुरोहित सर्वप्रथम कुशा के आसन पर बैठकर आचमन करता है और श्वेत सरसों के दानों को मंत्रोच्चार के साथ चारों दिशाओं में फेंककर वेताल, पिशाच, राक्षस और अन्य विघ्नकर्ताओं को उस पवित्र स्थल से दूर भगाता है (विघ्नोत्सारण) । तत्पश्चात सूर्य, चंद्र, नवग्रहों और पंचदेवताओं का आवाहन किया जाता है ।

बिल्व वृक्ष की शाखा को पाद्य (पैर धोने का जल), अर्घ्य, वस्त्र और गंध अर्पित करते हुए यह मंत्र पढ़ा जाता है: "ॐ बिल्ववृक्षाय नमः" । इसके पश्चात देवी दुर्गा का आवाहन 'जयंती' मंत्र ("ॐ जयंती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी। दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते॥") के साथ किया जाता है । यह मंत्र देवी के विभिन्न कल्याणकारी और रौद्र स्वरूपों को नमन करता है और उनसे सौभाग्य, आरोग्य एवं विजय की कामना करता है । देवी को संबोधित करते हुए पुरोहित कहता है: "ॐ भूर्भुवः स्वर्भगवति दुर्गे इहागच्छ इहागच्छ इह तिष्ठ" (हे भगवती दुर्गा, यहां आएं, यहां ठहरें) ।

आमंत्रण के पश्चात 'अधिवास' का अनुष्ठान होता है। इसमें देवी के सूक्ष्म रूप को बिल्व शाखा में आमंत्रित कर उन्हें पंचगव्य, विभिन्न प्रकार की पवित्र मिट्टियों और सुगंधित द्रव्यों से संस्कारित किया जाता है । यह अनुष्ठान इस गहन दार्शनिक सत्य को प्रमाणित करता है कि देवी केवल एक मिट्टी की मूर्ति (मृण्मयी) तक सीमित नहीं हैं, अपितु वे संपूर्ण वनस्पतियों और प्रकृति (चिन्मयी) का ही चैतन्य स्वरूप हैं。

द्वितीय दिन: महा-सप्तमी (नवपत्रिका स्थापन, कलश स्थापना, महास्नान एवं प्राण-प्रतिष्ठा)

सप्तमी की भोर दुर्गोत्सव के सबसे प्राचीन, गूढ़ और पारिस्थितिक (Ecological) अनुष्ठान से आरंभ होती है, जिसे 'नवपत्रिका' स्नान और स्थापन कहा जाता है । यद्यपि कालान्तर में मूर्ति पूजा ने प्रमुखता ले ली, परंतु नवपत्रिका की परंपरा आज भी दुर्गोत्सव का हृदय है, जो आदिम कृषि-परंपरा और प्रकृति-पूजन का निर्विवाद प्रमाण है ।

नवपत्रिका (कोला बोऊ) का विधान

सप्तमी के सूर्योदय (ब्रह्म मुहूर्त) से पूर्व नौ विशिष्ट पौधों की शाखाओं और पत्तियों को एक साथ एकत्र कर पीले धागे और सफेद अपराजिता की लता से बांधा जाता है । इसे लाल किनारे वाली सफेद साड़ी (पारंपरिक बंगाली वेशभूषा) पहनाई जाती है और इसके पत्तों पर सिंदूर लगाया जाता है। जनमानस में इसे 'कोला बोऊ' (गणेश की पत्नी) कहकर पुकारा जाता है और इसे भगवान गणेश की प्रतिमा के दाईं ओर स्थापित किया जाता है । परंतु शास्त्रीय रूप से यह नवपत्रिका देवी दुर्गा के नौ विभिन्न स्वरूपों (अष्टनायिका और दुर्गा) का ही प्रतिनिधित्व करती है ।

प्रत्येक पौधे का अपना एक विशिष्ट वानस्पतिक महत्व और उससे जुड़ी अधिष्ठात्री देवी है:

पौधा (Plant) वानस्पतिक नाम अधिष्ठात्री देवी (Goddess) दार्शनिक/प्राकृतिक प्रतीक
कदली (केले का तना) Musa ब्रह्माणी ब्रह्मांड की सृजन शक्ति
कच्चू (अरबी का पत्ता) Colocasia कालिका अंधकार और बुराई का नाश
हरिद्रा (हल्दी का पौधा) Curcuma longa दुर्गा आरोग्य, सुरक्षा और प्रचुरता
जयंती (जयंती की शाखा) Sesbania कार्तिकी विजय और देव-सेना का नेतृत्व
बिल्व (बेल पत्र) Aegle marmelos शिवा (शिव की शक्ति) कल्याण और आध्यात्मिक जागरण
दाड़िम (अनार की टहनी) Punica granatum रक्तदंतिका रक्तबीज जैसे विकारों का भक्षण
अशोक (अशोक का पत्ता) Saraca asoca शोकरहिता समस्त शोकों और दुखों का शमन
मान-कच्चू (अरुम का पौधा) Alocasia macrorrhizos चामुंडा उग्रता और महा-शक्तियों का दमन
धान्य (धान की बाली) Oryza sativa लक्ष्मी पोषण, कृषि समृद्धि और संपदा

इन नौ पौधों को ढोल (ढाक) और शंख ध्वनि के साथ नदी या जलाशय में ले जाकर वैदिक मंत्रों के साथ स्नान कराया जाता है । यह नवपत्रिका इस बात का प्रमाण है कि शक्ति साधना केवल अमूर्त ईश्वर की नहीं, बल्कि उस प्रकृति की साधना है जो समस्त ब्रह्मांड का पोषण करती है (शाकम्भरी रूप) ।

घट स्थापन (कलश स्थापना)

जल से भरा कलश ब्रह्मांडीय गर्भाशय (Cosmic Womb) और जीवन-स्रोत का प्रतीक है। एक अष्टदल कमल पर तांबे या मिट्टी के कलश को स्थापित कर उसमें पवित्र नदियों का जल भरा जाता है। कलश के मुख पर पंचपल्लव (आम, पीपल, बरगद, गूलर, पाकर के पत्ते) और एक जटाधारी श्रीफल (नारियल) रखा जाता है, जिसे लाल सूती वस्त्र से लपेटा जाता है । अखंड ज्योति प्रज्वलित की जाती है और कलश को देवी की चेतना का मुख्य एंटीना मानकर उसमें नवदुर्गा का आवाहन किया जाता है ।

महास्नान (दर्पण स्नान का वैज्ञानिक और तांत्रिक विधान)

सप्तमी के दिन देवी की विशाल मिट्टी की मूर्ति को भौतिक रूप से स्नान कराना संभव नहीं होता, अतः शास्त्रकारों ने इसके लिए 'दर्पण स्नान' की एक अत्यंत वैज्ञानिक और दार्शनिक विधि खोजी। एक चौड़े पात्र में जल भरकर उसमें दर्पण (Mirror) रखा जाता है, जिसमें देवी का प्रतिबिंब स्पष्ट दिखाई दे। इस प्रतिबिंब को मंत्रोच्चार के साथ स्नान कराया जाता है, जिसे महास्नान कहते हैं ।

इस महास्नान की भव्यता इस बात में है कि इसमें 8विशेष प्रकार की मिट्टी और 8विशेष प्रकार के जल का प्रयोग होता है, और प्रत्येक अर्पण के साथ एक विशिष्ट वाद्ययंत्र और शास्त्रीय राग का गायन अनिवार्य माना गया है :

जल का प्रकार (Water Type) प्रयुक्त शास्त्रीय राग (Raga) वाद्ययंत्र (Instrument)
पवित्र गंगा जल मालव (Malab) विजय वाद्य
वर्षा का शुद्ध जल ललित (Lalit) मृदंगम (Mridangam)
सरस्वती नदी का जल बिभास (Bivas) दुंदुभि (नगाड़ा)
समुद्र का खारा जल भैरव (Bhairav) भीम वाद्य
कमल पराग मिश्रित सुगंधित जल केदार (Kedar) इन्द्रभिषेक वाद्य
प्रपात (झरने) का जल बरारी (Barari) शंख (Conch)
समस्त तीर्थों का जल वसंत (Basanta) पंचशब्द (Woodwind)
सहस्रधारा (छिद्रयुक्त पात्र से) शुद्ध जल धनश्री / भैरवी सरोद

इस प्रक्रिया में दीमक की बांबी की मिट्टी, हाथी और वराह के दांतों से उखाड़ी गई मिट्टी, और वेश्या के द्वार की मिट्टी (पुण्य माटी) का प्रयोग होता है । वेश्या के द्वार की मिट्टी का प्रयोग इस दार्शनिक विचार को पुष्ट करता है कि मातृ-शक्ति समाज के उस हाशिए के वर्ग को भी अपने आगोश में लेती है, जिसे समाज ने तिरस्कृत कर दिया है। यह माना जाता है कि पुरुष जब वेश्यालय जाता है तो वह अपना सारा पुण्य वहीं छोड़ आता है, इसलिए वह मिट्टी सर्वाधिक पवित्र हो जाती है ।

प्राण-प्रतिष्ठा (चेतना का संचार)

महास्नान के पश्चात पुरोहित प्रतिमा में प्राण (चेतना) का संचार करता है। यह एक अत्यंत गुह्य तांत्रिक प्रक्रिया है, जिसमें पुरोहित कुशा और दाहिने हाथ की विशेष मुद्राओं के माध्यम से देवी के हृदय का स्पर्श करता है और मंत्रों द्वारा प्राणों का आह्वाहन करता है । प्राण-प्रतिष्ठा में 'पंचग्रास मुद्रा' का प्रयोग होता है, जिसमें मानव शरीर की पांच मुख्य वायुओं को जाग्रत किया जाता है । पुरोहित बाएं हाथ को एक विशेष मुद्रा में रखकर जल लेता है और दाहिने हाथ से देवी की ओर ऊर्जा को प्रवाहित करते हुए निम्नलिखित मंत्र पढ़ता है :

  • ॐ प्राणाय स्वाहा (श्वास-प्रश्वास क्रिया को समर्पित)
  • ॐ अपानाय स्वाहा (उत्सर्जन तंत्र को समर्पित)
  • ॐ समानाय स्वाहा (पाचन तंत्र को समर्पित)
  • ॐ उदानाय स्वाहा (ऊर्ध्वगामी ऊर्जा को समर्पित)
  • ॐ व्यानाय स्वाहा (संपूर्ण शरीर के रक्त-संचार को समर्पित)

इस प्रक्रिया और देवी के नेत्रों को उन्मीलित (खोलने) करने के उपरांत, मूर्ति केवल मिट्टी का ढांचा नहीं रह जाती, वह चिन्मयी (चेतना से युक्त) 'जीवित' विग्रह बन जाती है ।

तृतीय दिन: महा-अष्टमी (षोडशोपचार पूजन, अष्टमातृका एवं कुमारी पूजा)

अष्टमी का दिन दुर्गोत्सव का सबसे पवित्र, भावपूर्ण और ऊर्जावान दिन माना जाता है। इसी दिन भक्त उपवास रखते हैं और देवी को पुष्पांजलि अर्पित करते हैं ।

षोडशोपचार पूजन विधि

इस दिन देवी की 16 उपचारों (सामग्रियों) से विस्तृत पूजा की जाती है । पुरोहित "सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके" मंत्र के साथ आवाहन मुद्रा प्रदर्शित करता है । तदनंतर एक-एक कर सामग्रियां अर्पित की जाती हैं:

  • आसन (Seat): इदं रजतासनं (चांदी का आसन अर्पित है)।
  • पाद्य (Water for feet): एतत् पाद्यं (चरण पखारने हेतु जल)।
  • अर्घ्य (Welcome offering): गन्धपुष्पाक्षतैर्युक्तमर्घ्यं सम्पादितं मया। गृहाण त्वं महादेवि प्रसन्ना भव सर्वदा॥ (सुगंधित पुष्प और अक्षत युक्त अर्घ्य स्वीकार करें)।
  • आचमनीय (Water to drink/rinse): आचम्यतां त्वया देवि भक्तिं मे ह्यचलां कुरु।
  • स्नान (Bath): इदं स्नानीय जलं।
  • वस्त्र और आभूषण: इदं वस्त्रं और एतत् रजताभरणं।
  • गंध, पुष्प, धूप, दीप: एष गन्धः, एतानि पुष्पाणि, एष धूपः, एष दीपः।
  • नैवेद्य (Bhog): इदं सोपकरण मन्न नैवेद्यं (अन्न), एतानि फलमूलानि (फल और मूल), एतत् मधुपर्कं (मधु), एतत् परमान्नं (परमान्न/खीर) ।

कुमारी पूजन का दार्शनिक आधार

शास्त्रों (योगिनीतंत्र, कुलार्णव तंत्र, देवी पुराण) के अनुसार, देवी की सर्वोच्च और सर्वाधिक शुद्ध अभिव्यक्ति एक अबोध, कुंवारी कन्या में होती है । कुमारी कन्या में सृजन, स्थिति और संहार की वह मूल ऊर्जा सुप्त अवस्था में होती है, जो अभी सांसारिक विकारों से अछूती है । यद्यपि सैद्धांतिक रूप से किसी भी जाति या वर्ग (यहांतक कि वेश्या समुदाय) की कन्या का पूजन किया जा सकता है, किंतु पारंपरिक रूप से ब्राह्मण कन्या को चुना जाता रहा है । बंगाल में रामकृष्ण परमहंस ने अपनी पत्नी मां शारदा का पूजन कर और बाद में स्वामी विवेकानंद ने 10९8में कश्मीर में एक मुस्लिम नाविक की बेटी का कुमारी रूप में पूजन कर इस अनुष्ठान को एक नई सामाजिक और आध्यात्मिक ऊंचाई दी ।

कन्या की आयु (1 से 16 वर्ष) के अनुसार उसका शास्त्रीय नामकरण होता है, और उसी नाम से उसका पूजन किया जाता है :

आयु (Age) कुमारी का शास्त्रीय नाम पूजन से प्राप्त होने वाला फल (Benefits)
2 वर्ष कुमारिका (Kumarika) दुःख और दरिद्रता का समूल नाश
3 वर्ष त्रिमूर्ति (Trimurti) धर्म, अर्थ, काम की प्राप्ति एवं धन-धान्य की प्रचुरता
4 वर्ष कल्याणी (Kalyani) विद्या, राजकीय सफलता, शक्ति और सुख की प्राप्ति
5 वर्ष रोहिणी (Rohini) समस्त रोगों से मुक्ति और उत्तम स्वास्थ्य का लाभ
6 वर्ष कालिका (Kalika) शत्रुओं और विरोधियों पर पूर्ण विजय
7 वर्ष चंडिका (Chandika) ऐश्वर्य और अपार धन-संपदा की प्राप्ति
8वर्ष शाम्भवी (Shambhavi) विवादों में विजय, सत्ता का सहयोग और दरिद्रता का नाश
9वर्ष दुर्गा (Durga) विघ्न-विनाश और इहलोक-परलोक में सुख
10 वर्ष सुभद्रा (Subhadra) अभीष्ट कामनाओं की पूर्ति और अभद्र (अशुभ) का नाश

(शास्त्रों के अनुसार एक वर्ष की कन्या का पूजन वर्जित है क्योंकि वह गंध, पुष्प आदि पूजा सामग्रियों के प्रति आकर्षण व्यक्त करने में असमर्थ होती है। दस वर्ष से ऊपर की कन्याओं (11 वर्ष- रुद्राणी, 12 वर्ष- भैरवी, 16 वर्ष- अन्नदा/अम्बिका) का उल्लेख मिलता है, किंतु रजोदर्शन के पश्चात उन्हें इस विशिष्ट अनुष्ठान से मुक्त रखा जाता है) ।

अष्टमातृका एवं चौसठ योगिनी पूजन

अष्टमी के ही दिन देवी की 'उग्रचंडा' आदि आठ शक्तियों तथा चौसठ (64) योगिनियों का आवाहन लाल चंदन और पुष्पों से किया जाता है । पुरोहित मंत्र पढ़ता है: ॐ उग्रचंडायै नमः। अत्राधिष्ठानं कुरु मम पूजां गृहाण। (हे उग्रचंडा, मेरे समीप आएं, अपनी उपस्थिति स्थापित करें और मेरी पूजा स्वीकार करें) ।

संधिक्षण: महा-अष्टमी और महा-नवमी का तांत्रिक संगम (संधि पूजा)

दुर्गोत्सव का सबसे रहस्यमयी, तीव्र और महत्वपूर्ण अनुष्ठान 'संधि पूजा' है। यह पूजा ठीक उस समय होती है जब अष्टमी तिथि समाप्त हो रही होती है और नवमी तिथि का आरंभ होता है। अष्टमी के अंतिम 24 मिनट (1 दंड) और नवमी के प्रारंभिक 24 मिनट को मिलाकर कुल 48मिनट (2 घटी) के काल को 'संधि काल' कहा जाता है । उदाहरणार्थ, यदि 2025 में यह काल सायं 5:42 से 6:30 तक है, तो अनुष्ठान को इसी निश्चित अवधि में पूर्ण करना अनिवार्य है ।

चंड-मुंड वध का पौराणिक संदर्भ

मार्कण्डेय पुराण (दुर्गा सप्तशती) के सातवें अध्याय के अनुसार, जब महिषासुर के दो खूंखार सेनापति 'चंड' और 'मुंड' ने पीछे से देवी दुर्गा पर आक्रमण करने का दुस्साहस किया, तो देवी का मुख क्रोध से स्याह (नीला-काला) पड़ गया । ठीक इसी संधिक्षण में देवी की तीसरी आंख से 'चामुंडा' का अत्यंत भयानक और रौद्र रूप प्रकट हुआ। चामुंडा ने हाथों में खड्ग और पाश लिए हुए चंड और मुंड के सिर धड़ से अलग कर दिए ।

अनुष्ठानिक विधि और 108का ब्रह्मांडीय रहस्य

संधि पूजा के दौरान संपूर्ण वातावरण एक अतीन्द्रिय शक्ति से भर जाता है। इस पूजा में देवी को 108बिल्व पत्र, 108लाल कमल और लाल फल (अखंड फल, विशेषकर अनार या सेब) अर्पित किए जाते हैं । सबसे महत्वपूर्ण विधान 108मिट्टी के दीयों (घृत दीप) का एक साथ प्रज्वलित किया जाना है ।

108दीपों का अर्थ: 108की संख्या केवल गणितीय नहीं है; यह मानव शरीर की 108प्रमुख नाड़ियों (Energy channels) का प्रतीक है। संधि काल के गहन क्षणों में 108दीपों का एक साथ जलना, साधक के भीतर सोई हुई कुण्डलिनी शक्ति के पूर्ण प्रदीपन (Illumination) और अज्ञान (चंड-मुंड) के तत्क्षण संहार का रूपक है । भगवान राम ने भी रावण वध से पूर्व 108नील कमलों से देवी की स्तुति की थी ।

चामुंडा ध्यान मंत्र:

ॐ नील-उत्पल दल-श्यामां चतुर्बाहु समन्विताम्... ॐ काली करालवदना विनिष्क्रान्तासिपाशिनी। विचित्रखट्वाङ्गधरा नरमालाविभूषणा।।

(अर्थात्: मैं उस देवी चामुंडा को नमन करता हूँ, जिनका वर्ण खिले हुए नीले कमल के समान है, जो चार भुजाएं धारण करती हैं, जिनके हाथ में खड्ग और पाश है, और जो नरमुंडों की माला से विभूषित हैं) ।

इस काल में देवी के नवार्ण मंत्र (ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे) का कम से कम 108बार सस्वर जप किया जाता है । खगोलीय दृष्टि से (Astrological significance), इस काल में ब्रह्मांडीय ऊर्जा अपने सर्वोच्च और सबसे अस्थिर (unstable) स्तर पर होती है। इस समय ढाक (Dhak) की तीव्र ध्वनि, शंख-नाद और तोप या बंदूक दागने (बंगाल के पारंपरिक जमींदार परिवारों जैसे 'दत्त परिवार' में) की प्रथा उसी ब्रह्मांडीय युद्ध के नाद को पृथ्वी पर पुनर्जीवित करती है ।

चतुर्थ दिन: महा-नवमी (महानवमी होम, नैवेद्य एवं शास्त्रीय बलि-प्रथा)

नवमी का दिन देवी की पूर्ण सिद्ध शक्तियों के प्रकटीकरण का दिन है, जब उन्होंने महिषासुर का अंतिम रूप से संहार किया था । इस दिन का मुख्य आकर्षण नवमी होम (हवन), विशेष नैवेद्य और बलि-प्रथा है ।

महानवमी होम (हवन)

दुर्गोत्सव के दौरान की गई पूजा, पाठ या प्राण-प्रतिष्ठा में यदि कोई त्रुटि रह गई हो, तो उसकी पूर्णता और देवताओं को प्रत्यक्ष आहुति पहुंचाने के लिए नवमी के अपराह्न (दोपहर) काल में विस्तृत हवन किया जाता है । बेलूर मठ और अन्य शास्त्रीय अनुष्ठानों में, रघुनंदन के 'दुर्गोत्सव तत्त्व' के अनुसार यह होम वैदिक और तान्त्रिक दोनों पद्धतियों का एक अत्यंत गूढ़ मिश्रण होता है । इसमें तिल, घी, चंदन और विशिष्ट हवन सामग्री (हविष्य) के साथ अग्नि देव के माध्यम से देवी के निमित्त आहुतियां दी जाती हैं ।

शास्त्रीय बलि-प्रथा (Animal and Symbolic Sacrifice)

शाक्त परंपरा में, विशेषकर कालिका पुराण के 'रुधिराध्याय' (अध्याय 67-70) और महानिर्वाण तंत्र में, देवी को बलि अर्पित करने का स्पष्ट विधान है । वैदिक काल से ही यज्ञों में बलि का महत्व रहा है, जो कालांतर में तांत्रिक पद्धतियों में समाहित हो गया । तांत्रिक दृष्टि से 'बलि' का अर्थ किसी प्राणी की हत्या नहीं, अपितु ब्रह्मांडीय शक्ति का आवाहन और अपने भीतर के पाश (Bonds) को काटना है。

जब किसी पशु (बकरे, भैंसे आदि) की बलि दी जाती है, तो उसे 'पशु-गायत्री' मंत्र के द्वारा पशु योनि से मुक्त कर उच्चतर लोकों में भेजने की प्रक्रिया माना जाता है ।

पशु-गायत्री मंत्र विधान: महानिर्वाण तंत्र के अनुसार, बलि से पूर्व पशु के शरीर को विशेष अर्घ्य से सिंचित कर 'धेनु मुद्रा' द्वारा अमृतमय किया जाता है। तत्पश्चात पुरोहित पशु के दाहिने कान में पशु-गायत्री मंत्र फूंका जाता है: "पाश-बद्धाय विद्महे शिरच्छेदया धीमहि तन्नो पशुः प्रचोदयात्" (यह मंत्र पशु को उसके पशु-पाश से मुक्त करता है) । तांत्रिक साधक वास्तव में बाहर के पशु को नहीं, अपितु अपने भीतर बैठे पशुत्व (काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, आलस्य रूपी छः शत्रुओं) की बलि देता है ।

वानस्पतिक बलि एवं 'शत्रु-बलि' (Shatru Bali): वर्तमान युग में, और अनेक रूढ़िवादी वैष्णव-प्रभावित स्मार्त परिवारों में, रक्त-बलि का स्थान प्रतीकात्मक बलि ने ले लिया है । इसके अंतर्गत सफेद कुष्मांड (पेठा/कद्दू), ईख (गन्ना), या ककड़ी की बलि खड्ग से दी जाती है ।

बंगाल के हावड़ा स्थित अंदुल के दत्त चौधरी जैसे 500 वर्ष पुराने जमींदार परिवारों में 'शत्रु-बलि' की एक विशिष्ट और प्राचीन परंपरा आज भी जीवित है। इसमें चावल के आटे, केले और कुष्मांड को मिलाकर एक मानव-आकृति (पुतला) बनाई जाती है, जिसे 'शत्रु' का नाम दिया जाता है। नवमी की रात को इस पुतले का सिर खड्ग से काटा जाता है, जो साधक के आंतरिक (मनोवैज्ञानिक) और बाह्य शत्रुओं के प्रतीकात्मक संहार का सूचक है । बलि के पश्चात का मांस (जहाँ पशु बलि होती है) बिना प्याज-लहसुन के सात्विक मसालों के साथ पकाया जाता है जिसे 'निरामिष मांगशो' कहा जाता है, और इसे महाप्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है ।

पंचम दिन: विजया दशमी (अपराजिता पूजा, दर्पण विसर्जन एवं दान-विधान)

दशमी का दिन देवी की अपने पति शिव के पास कैलाश वापसी और महिषासुर पर उनकी पूर्ण विजय (विजया दशमी) का उत्सव है । इस दिन विषाद (विदाई का दुःख) और उल्लास दोनों का अद्भुत मनोवैज्ञानिक संगम होता है ।

अपराजिता पूजा

विसर्जन की मुख्य प्रक्रिया से पूर्व, अपराह्न काल (दोपहर के तीसरे प्रहर) में गांव या नगर की सीमा के ईशान कोण (North-East) में अपराजिता देवी (दुर्गा का अजेय स्वरूप) की पूजा की जाती है । यह पूजा किसी भी नई यात्रा या कार्य के आरंभ से पूर्व विजय सुनिश्चित करने के लिए की जाती है (पौराणिक मान्यता है कि भगवान राम ने रावण वध से पूर्व यही पूजा की थी) ।

  • शमी/आप्टा वृक्ष की पूजा: भूमि पर चंदन से अष्टदल कमल (Ashtadal Chakra) बनाकर देवी अपराजिता की स्थापना की जाती है और उसके समीप शमी वृक्ष की पूजा की जाती है ।
  • अपराजिता स्तोत्र एवं शमी मंत्र: शमी वृक्ष को स्पर्श करते हुए पुरोहित पढ़ता है: "शमयते पापं शमी लोहितकण्टका। धारिण्यर्जुनबाणानां रामस्य प्रियवादिनी।।" (शमी वृक्ष पापों का नाश करने वाला है। यह अर्जुन के अस्त्रों को धारण करने वाला और राम का प्रिय है। मेरी यात्रा को निर्विघ्न करें) ।
  • विजय स्तुति: तत्पश्चात अपराजिता देवी की स्तुति की जाती है: "हारेण तु विचित्रेण भास्वत्कनकमेखला। अपराजिता भद्ररता करोतु विजयं मम।।" (स्वर्ण मेखला धारण करने वाली हे अपराजिता देवी, मुझे सर्वत्र विजय प्रदान करें) । इस पूजा के पश्चात 'दधिकर्मा' (पोहा/खोई और दही का मिश्रण) का प्रसाद वितरित किया जाता है ।

दर्पण विसर्जन (Darpan Visarjan)

भौतिक मिट्टी की मूर्ति को जल में विसर्जित करने से पूर्व तात्विक रूप से देवी की ऊर्जा (प्राण) को वापस ब्रह्मांडीय स्रोत (निराकार) में विलीन किया जाता है। एक ताम्र या मिट्टी के पात्र में जल भरकर उसमें दर्पण (Mirror) रखा जाता है। पुरोहित विसर्जन मंत्रों के उच्चारण के साथ दर्पण में देवी के चरणों का अंतिम दर्शन करता है । जल के स्थिर होने पर दर्पण में देवी का प्रतिबिंब हिलना बंद कर देता है, जो इस बात का दार्शनिक प्रमाण है कि देवी का 'प्राण' (Divine Spirit) अब उस मिट्टी की मूर्ति से निकलकर पुनः निराकार जल-तत्व में विलीन हो गया है और वह मूर्ति अब जीवन-रहित (Lifeless) हो चुकी है । यह अत्यंत भावुक क्षण होता है जो यह स्मरण कराता है कि 'मृण्मयी' अब पुनः मिट्टी बन चुकी है और 'चिन्मयी' कैलाश लौट चुकी है ।

सिंदूर खेला और मूर्ति विसर्जन

जल समाधि से पूर्व विवाहित महिलाएं (सधवा) लाल किनारे वाली सफेद साड़ियों में सजकर देवी को सिंदूर, पान, और मिष्ठान्न अर्पित करती हैं तथा उनका वरण करती हैं (बोरॉन) । तत्पश्चात वे उल्लू ध्वनि (Ulu Dhwani) करते हुए एक-दूसरे के गालों और मांग में सिंदूर लगाती हैं (सिंदूर खेला), जो अखंड सौभाग्य, देवी के प्रति कृतज्ञता और समुदाय में स्त्री-शक्ति के उत्सव (Social Cohesion) का जीवंत प्रतीक है ।

अंततः, शंख, करताल और ढाक की गगनभेदी ध्वनि के बीच भारी मूर्तियों को शोभायात्रा के साथ किसी पवित्र नदी या जलाशय में ले जाकर विसर्जित (जल-समाधि) किया जाता है । विसर्जन के उपरांत पुरोहित कलश का पवित्र जल (शांति जल) आम के पत्तों से सभी उपस्थित भक्तों पर छिड़कता है, जो इस बात का द्योतक है कि देवी का भौतिक स्वरूप भले ही ओझल हो गया हो, उनका दिव्य आशीर्वाद और ब्रह्मांडीय शांति सर्वत्र व्याप्त है ।

दान-विधान एवं दक्षिणा

सनातन धर्म के कर्मकांडीय नियमों के अनुसार बिना दान और दक्षिणा के कोई भी अनुष्ठान पूर्ण या फलदायी नहीं माना जाता । नवमी और दशमी के दिन यजमान द्वारा ब्राह्मणों (पुरोहितों) को उनके भरण-पोषण हेतु अन्न, वस्त्र, गौ-तुल्य मूल्य, स्वर्ण (यथासामर्थ्य), और रजत मुद्राओं का दान किया जाता है । कुमारी पूजन में भाग लेने वाली कुमारियों को देवी का साक्षात् स्वरूप मानकर वस्त्र, मिष्ठान्न, आभूषण और दक्षिणा भेंट की जाती है । यह दान केवल एक भौतिक लेन-देन नहीं है, अपितु यह यजमान के 'अहंकार' और संपत्ति के प्रति उसके मोह के विसर्जन की अंतिम आध्यात्मिक प्रक्रिया है。

निष्कर्ष

बंगाल की पांच-दिवसीय पारंपरिक दुर्गा पूजा (षष्ठी से दशमी) केवल एक सांस्कृतिक या लोकोत्सव नहीं है, अपितु यह रघुनंदन कृत 'दुर्गोत्सव तत्त्व' जैसे स्मार्त-तांत्रिक ग्रंथों पर आधारित एक अत्यंत परिष्कृत आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक विज्ञान है। षष्ठी के दिन बिल्व वृक्ष के नीचे बोधन के माध्यम से प्रकृति में सुप्त चेतना को जाग्रत करने से लेकर, सप्तमी को नवपत्रिका के माध्यम से संपूर्ण पारिस्थितिकी (Ecology) का देवत्वीकरण, महास्नान की प्रक्रिया में समाज के तिरस्कृत वर्ग (वेश्या-द्वार की मिट्टी) का समावेश, और अष्टमातृका एवं कुमारी पूजन द्वारा स्त्री-अस्मिता की चरम वंदना—यह सब भारतीय दर्शन की व्यापकता को दर्शाते हैं。

अष्टमी और नवमी के संधिक्षण में 108दीपों के प्रकाश में अज्ञान रूपी चंड-मुंड का वध (संधि पूजा) और नवमी को बलि के माध्यम से अपने भीतर के पशुत्व का संहार, इस अनुष्ठान को एक तीव्र आंतरिक साधना में बदल देते हैं। अंततः, दशमी को अपराजिता पूजा के बाद दर्पण विसर्जन के माध्यम से सगुण (साकार) रूप को पुनः निर्गुण (निराकार) में विलीन कर देना—यह संपूर्ण अनुष्ठान मानव-चेतना की उसी ऊर्ध्वमुखी यात्रा का आख्यान है, जहाँ साधक मिट्टी की 'मृण्मयी' में चेतना की 'चिन्मयी' को देखता है, और अंततः यह अनुभव करता है कि जो शक्ति इस ब्रह्मांड का संचालन कर रही है, वही उसके स्वयं के भीतर भी स्पंदित हो रही है। दुर्गोत्सव इसी शाश्वत अद्वैत का सबसे भव्य और सजीव कलात्मक प्रकटीकरण है。

❓ इस विषय के 5 प्रश्न

पूजा विधि

दुर्गा पूजा घर पर कैसे करें?

ईशान कोण में देवी प्रतिमा स्थापित करें। आचमन, संकल्प, पंचोपचार पूजन (जल, चंदन, सिंदूर, लाल फूल, भोग), नवार्ण मंत्र जप, देवी सूक्त पाठ और आरती करें। नवरात्रि में अखंड दीप और नवमी को कन्या पूजन अनिवार्य है।

पूजा विधि

दुर्गा पूजा घर पर कैसे करें?

घर पर दुर्गा पूजा: लाल चुनरी, कुमकुम, लाल गुड़हल, धूप-दीप। आवाहन 'ॐ जयंती मंगला काली...' से करें। पंचोपचार, नवार्ण मंत्र 108 बार, सप्तशती पाठ या 'या देवी सर्वभूतेषु...' स्तोत्र, आरती 'जय अम्बे गौरी...' और क्षमा प्रार्थना।

दुर्गा पूजा

दुर्गा मां की मूर्ति स्थापना की विधि और दिशा क्या होनी चाहिए?

दिशा: पूर्व/उत्तर (ईशान कोण सर्वोत्तम)। विधि: गंगाजल शुद्धि → लाल कपड़ा चौकी → कलश → शुभ मुहूर्त में मूर्ति → प्राण प्रतिष्ठा → षोडशोपचार → सप्तशती/चालीसा → आरती। नियम: ऊंचे स्थान, शयनकक्ष से दूर, प्रतिदिन पूजा अनिवार्य।

देवी महात्म्य

दुर्गा पूजा का महत्व क्या है?

दुर्गा पूजा त्रिदेवों की संयुक्त शक्ति का उत्सव है — महिषासुर वध का स्मरण। आध्यात्मिक रूप से यह तमस-रजस-अहंकार का नाश और आंतरिक शक्ति की जागृति है। सप्तशती में कहा गया — शत्रु भय, रोग, दरिद्रता नाश और मोक्ष इसके फल हैं।

पूजा विधि

महामाया की पूजा कैसे करते हैं?

महामाया पूजा: दुर्गा या काली रूप में। नवरात्रि अष्टमी-नवमी = दुर्गा सप्तशती मंत्रों से। दुर्गा सप्तशती प्रथम अध्याय पाठ (योगनिद्रा महिमा)। 'दुर्गे समस्यात्मिका जगन्माता महामाया' मंत्र से वंदना। भक्तभाव = सरल हृदय से पुकारना।

📚 इसे भी पढ़ें

शारदीय नवरात्रि पूजा विधि: शास्त्रसम्मत पूजन-विधान एवं देवी आराधना का प्रामाणिक शोध
Puja Vidhi

शारदीय नवरात्रि पूजा विधि: शास्त्रसम्मत पूजन-विधान एवं देवी आराधना का प्रामाणिक शोध

नवरात्रि पूजा विधि: कलश स्थापना, घटस्थापना, संपूर्ण सामग्री एवं मंत्र
Katha

नवरात्रि पूजा विधि: कलश स्थापना, घटस्थापना, संपूर्ण सामग्री एवं मंत्र

नवग्रह शांति पूजा विधि: जन्मपत्रिका दोष निवारण हेतु ग्रह-शांति यज्ञ की शास्त्रसम्मत विधि
Puja Vidhi

नवग्रह शांति पूजा विधि: जन्मपत्रिका दोष निवारण हेतु ग्रह-शांति यज्ञ की शास्त्रसम्मत विधि

महामृत्युंजय मंत्र जप अनुष्ठान पूजा विधि: रोग-निवारण एवं दीर्घायु हेतु शास्त्रसम्मत विधि
Puja Vidhi

महामृत्युंजय मंत्र जप अनुष्ठान पूजा विधि: रोग-निवारण एवं दीर्घायु हेतु शास्त्रसम्मत विधि

रामनवमी पूजा विधि: मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम जन्मोत्सव की शास्त्रसम्मत पूजा-विधि एवं व्रत-विधान
Puja Vidhi

रामनवमी पूजा विधि: मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम जन्मोत्सव की शास्त्रसम्मत पूजा-विधि एवं व्रत-विधान

रुद्राभिषेक पूजा विधि: शास्त्रसम्मत विधि, मंत्र-विधान एवं अनुष्ठानिक मीमांसा
Puja Vidhi

रुद्राभिषेक पूजा विधि: शास्त्रसम्मत विधि, मंत्र-विधान एवं अनुष्ठानिक मीमांसा

दीपावली लक्ष्मी-गणेश पूजा विधि: महालक्ष्मी एवं श्रीगणेश पूजन की शास्त्रसम्मत विधि
Puja Vidhi

दीपावली लक्ष्मी-गणेश पूजा विधि: महालक्ष्मी एवं श्रीगणेश पूजन की शास्त्रसम्मत विधि

गणेश विसर्जन पूजा विधि: शास्त्रसम्मत विधि एवं अनुष्ठानिक विवेचन
Puja Vidhi

गणेश विसर्जन पूजा विधि: शास्त्रसम्मत विधि एवं अनुष्ठानिक विवेचन

अक्षय तृतीया पूजा विधि: शास्त्रसम्मत पूजा-विधि, दान-विधान एवं अनुष्ठानिक मीमांसा
Puja Vidhi

अक्षय तृतीया पूजा विधि: शास्त्रसम्मत पूजा-विधि, दान-विधान एवं अनुष्ठानिक मीमांसा

गणेश चतुर्थी पूजा विधि: श्रीगणपति स्थापना एवं दश-दिवसीय पूजन की शास्त्रसम्मत विधि
Puja Vidhi

गणेश चतुर्थी पूजा विधि: श्रीगणपति स्थापना एवं दश-दिवसीय पूजन की शास्त्रसम्मत विधि

वट सावित्री व्रत पूजा विधि: शास्त्रसम्मत पूजा-विधि एवं अनुष्ठानिक विश्लेषण
Puja Vidhi

वट सावित्री व्रत पूजा विधि: शास्त्रसम्मत पूजा-विधि एवं अनुष्ठानिक विश्लेषण

धनतेरस पूजा विधि: भगवान धन्वंतरि एवं कुबेर पूजन की शास्त्रसम्मत विधि
Puja Vidhi

धनतेरस पूजा विधि: भगवान धन्वंतरि एवं कुबेर पूजन की शास्त्रसम्मत विधि