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पर्व📜 देवी भागवत पुराण, कालिका पुराण, बंगाली दुर्गा पूजा परम्परा2 मिनट पठन

दुर्गा पूजा में विजयादशमी पर अपराजिता पूजा क्या है

संक्षिप्त उत्तर

अपराजिता पूजा: विजयदशमी अपराह्न में। अपराजिता = अपराजित देवी (दुर्गा रूप)। ईशान कोण में अष्टदल कमल → अपराजिता पुष्प (नीले) + शमी पत्र → 'ॐ अपराजितायै नमः'। राम ने लंका विजय पूर्व की। बंगाल: दुर्गा विसर्जन से पूर्व। विजय और सफलता हेतु।

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विस्तृत उत्तर

विजयदशमी (दशहरा) पर अपराजिता पूजा एक विशिष्ट अनुष्ठान है जो विशेषकर बंगाल, ओडिशा और पूर्वी भारत की दुर्गा पूजा परम्परा में किया जाता है।

अपराजिता कौन हैं

अपराजिता' = जो कभी पराजित न हो। यह देवी दुर्गा/पार्वती का एक रूप है। अपराजिता पूजा विजय और सफलता हेतु की जाती है।

कब

विजयदशमी (आश्विन शुक्ल दशमी) के अपराह्न काल (दोपहर बाद) में।

विधि

  1. 1ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) दिशा में स्वच्छ स्थान पर अष्टदल कमल (8 पंखुड़ियों वाला कमल) या रंगोली बनाएँ।
  2. 2उस पर देवी अपराजिता की प्रतिमा/चित्र स्थापित करें।
  3. 3अपराजिता पुष्प (नीले रंग के फूल — Clitoria ternatea) अर्पित करें।
  4. 4'ॐ अपराजितायै नमः' मंत्र से पूजन।
  5. 5धूप, दीप, नैवेद्य अर्पित।
  6. 6शमी पत्र (शमी वृक्ष के पत्ते) भी अर्पित।
  7. 7विजय प्रार्थना: 'हे देवी अपराजिता, मुझे सर्वत्र विजय प्रदान करें।'

बंगाल में विशेष

दुर्गा विसर्जन से पूर्व अपराजिता पूजा होती है। विसर्जन यात्रा ('इमर्सन') से पहले देवी से विदाई और अगले वर्ष पुनः आगमन की प्रार्थना।

महत्व

  • श्रीराम ने लंका विजय से पूर्व देवी अपराजिता की पूजा की थी।
  • किसी भी बड़े अभियान, यात्रा, या कार्य से पूर्व विजय हेतु।
  • 'अपराजिता' = पराजय न होने का वरदान।
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शास्त्रीय स्रोत
देवी भागवत पुराण, कालिका पुराण, बंगाली दुर्गा पूजा परम्परा
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