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हिंदू दर्शन📜 भगवद्गीता — अध्याय 14 (गुणत्रय विभाग योग), सांख्य दर्शन2 मिनट पठन

गीता में तीन गुणों सत्व रज तम का वर्णन

संक्षिप्त उत्तर

गीता 14: सत्व = ज्ञान, प्रकाश, सुख (ऊर्ध्वगति); रजस् = आसक्ति, कामना, अशांति (मध्य गति); तमस् = अज्ञान, आलस्य, प्रमाद (अधोगति)। तीनों बांधते हैं। गुणातीत = तीनों से परे, समभावी। उपाय: सात्विक आहार, सत्संग, ध्यान से सत्व बढ़ाएं।

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विस्तृत उत्तर

गीता अध्याय 14 (गुणत्रय विभाग योग) में तीन गुणों का विस्तृत वर्णन है। प्रकृति (माया) तीन गुणों से बनी है — सत्व, रजस्, तमस्। सभी प्राणी, कर्म, विचार इन्हीं से प्रभावित हैं।

1सत्वगुण (14.6, 14.11)

  • स्वभाव — प्रकाश, ज्ञान, निर्मलता, सुख, शांति।
  • बंधन — सुख और ज्ञान की आसक्ति से बांधता है ('सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ')।
  • लक्षण — सभी द्वारों (इंद्रियों) से प्रकाश/ज्ञान विकीर्ण हो — सत्व प्रबल।
  • फल — ऊर्ध्वगति (उच्च लोक), ज्ञान, प्रसन्नता।
  • उदाहरण — ज्ञानी, साधु, सात्विक व्यक्ति।

2रजोगुण (14.7, 14.12)

  • स्वभाव — आसक्ति, कामना, लालसा, अशांति, सक्रियता।
  • बंधन — कर्मफल की आसक्ति से बांधता है ('कर्मसङ्गेन बध्नाति')।
  • लक्षण — लोभ, प्रवृत्ति, आरंभ (नई-नई चीजें शुरू करना), अशांति।
  • फल — मध्य गति (मनुष्य लोक), कर्म बंधन।
  • उदाहरण — महत्वाकांक्षी, अस्थिर, लालची।

3तमोगुण (14.8, 14.13)

  • स्वभाव — अज्ञान, आलस्य, प्रमाद, निद्रा, मोह।
  • बंधन — अज्ञान और प्रमाद से बांधता है ('प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति')।
  • लक्षण — अप्रकाश (अंधकार), अप्रवृत्ति (निष्क्रियता), प्रमाद (लापरवाही)।
  • फल — अधोगति (निम्न योनि), अज्ञान, दुःख।
  • उदाहरण — आलसी, अज्ञानी, प्रमादी।

गुणातीत (14.22-26) — तीनों से परे

अर्जुन ने पूछा — गुणातीत की पहचान? कृष्ण: जो प्रकाश (सत्व), प्रवृत्ति (रज), मोह (तम) आने पर न द्वेष करे और न होने पर इच्छा करे। सुख-दुख, मान-अपमान, मित्र-शत्रु में समान — वह गुणातीत है।

व्यावहारिक सुझाव

सत्व बढ़ाएं — सात्विक आहार (ताजा, शुद्ध), सत्संग, स्वाध्याय, ध्यान। रज-तम घटाएं — अत्यधिक तीखा/मसालेदार/बासी भोजन, आलस्य, अज्ञानता त्यागें।

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शास्त्रीय स्रोत
भगवद्गीता — अध्याय 14 (गुणत्रय विभाग योग), सांख्य दर्शन
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