विस्तृत उत्तर
हिंदू काल चक्र में चार युग हैं — सतयुग, त्रेता, द्वापर, कलियुग। प्रत्येक युग में धर्म (नैतिकता) क्रमशः घटता है।
धर्म का बैल रूपक
विष्णु पुराण और भागवत पुराण में धर्म को चार पैरों वाले बैल के रूप में दर्शाया गया है — सत्य, दया, तप, दान/शौच।
1सतयुग (कृतयुग) — धर्म 4/4 पैर
- ▸अवधि: 17,28,000 वर्ष। मनुष्य आयु: ~1,00,000 वर्ष।
- ▸सत्य, दया, तप, दान — चारों विद्यमान।
- ▸सभी धर्मनिष्ठ। कोई पाप नहीं। वर्ण व्यवस्था नहीं — सब ब्राह्मण तुल्य।
- ▸ध्यान/तपस्या प्रमुख साधना।
2त्रेतायुग — धर्म 3/4 पैर
- ▸अवधि: 12,96,000 वर्ष। मनुष्य आयु: ~10,000 वर्ष।
- ▸सत्य, दया, तप विद्यमान; दान/शौच में कमी।
- ▸यज्ञ प्रमुख साधना। वर्ण व्यवस्था प्रारंभ।
- ▸राम अवतार — मर्यादा स्थापना।
3द्वापरयुग — धर्म 2/4 पैर
- ▸अवधि: 8,64,000 वर्ष। मनुष्य आयु: ~1,000 वर्ष।
- ▸सत्य और दया विद्यमान; तप और दान क्षीण।
- ▸पूजा-अर्चना प्रमुख साधना।
- ▸कृष्ण अवतार — धर्म-अधर्म का भीषण संघर्ष (महाभारत)।
4कलियुग — धर्म 1/4 पैर
- ▸अवधि: 4,32,000 वर्ष। मनुष्य आयु: ~100 वर्ष।
- ▸केवल सत्य (वह भी क्षीण) शेष; दया, तप, दान लुप्तप्राय।
- ▸भागवत 12.2 — राजा शोषक, ब्राह्मण अज्ञानी, स्त्रियां असुरक्षित, धन ही प्रतिष्ठा का आधार।
- ▸नाम जप/मंत्र/भक्ति प्रमुख साधना।
- ▸कलियुग का वरदान — सतयुग में जो लाखों वर्ष तप से मिलता, कलियुग में नाम स्मरण मात्र से मिलता है।
कल्कि अवतार
कलियुग के अंत में विष्णु का कल्कि अवतार होगा जो अधर्मियों का संहार कर पुनः सतयुग स्थापित करेगा।
ध्यान दें: युगों की अवधि और विवरण विभिन्न पुराणों में भिन्न हैं। उपरोक्त आंकड़े सर्वाधिक प्रचलित (सूर्य सिद्धांत/विष्णु पुराण आधारित) हैं।





