आश्रम धर्मवानप्रस्थ आश्रम कब लें और कैसे जिएँ?~50-65/बच्चे स्वतंत्र। सम्पत्ति सौंपो, सरल जीवन, NGO/मंदिर सेवा, ज्ञान बांटो, ध्यान/गीता/तीर्थ। भोग→योग। वानप्रस्थ≠त्याग=प्राथमिकता बदलो — संसार में रहो, संसार से मुक्त।#वानप्रस्थ#आश्रम#सेवानिवृत्ति
आश्रम धर्मगृहस्थ आश्रम सबसे श्रेष्ठ क्यों?मनुस्मृति: 'सब आश्रम गृहस्थ पर निर्भर'(वायु समान)। सबका पालक, पंचमहायज्ञ, संतान, दान=गृहस्थ ही। गीता: संसार में धर्म=सबसे कठिन तपस्या=असली। हिमालय=आसान, परिवार=तपस्या।#गृहस्थ#श्रेष्ठ#आश्रम
आश्रम व्यवस्थागृहस्थ आश्रम सबसे श्रेष्ठ क्यों कहा गया?मनुस्मृति: 'सभी आश्रम गृहस्थ पर निर्भर' (वायु जैसे)। सबका पोषक, पंचमहायज्ञ, संतान, धर्म+अर्थ+काम, सेवा। सबसे कठिन+पुण्यदायक। बिना गृहस्थ=अन्य आश्रम असंभव।#गृहस्थ#आश्रम#श्रेष्ठ
तीर्थ स्थलऋषिकेश में कौन से आश्रम जरूर जाएं?परमार्थ निकेतन(गंगा आरती), शिवानंद आश्रम(योग/वेदांत), वशिष्ठ गुफा(ध्यान), बीटल्स आश्रम, स्वर्ग आश्रम, योग निकेतन। लक्ष्मण झूला, नीलकंठ महादेव भी।#ऋषिकेश#आश्रम#योग
रामचरितमानस — बालकाण्डभरद्वाजजी का आश्रम कहाँ था?प्रयाग (प्रयागराज) में — गंगा-यमुना-सरस्वती के त्रिवेणी संगम के निकट। माघ मेले में ऋषि-मुनि उनके आश्रम में एकत्र होते थे।#बालकाण्ड#भरद्वाज#आश्रम
हिंदू दर्शनगृहस्थ और संन्यास में श्रेष्ठ क्या है?मनुस्मृति और गीता दोनों के अनुसार गृहस्थाश्रम श्रेष्ठ है — सभी तीन अन्य आश्रम गृहस्थ पर ही निर्भर हैं। गीता में निष्काम कर्मी गृहस्थ को अकर्मण्य संन्यासी से श्रेष्ठ बताया गया है। राजा जनक गृहस्थ रहते हुए जीवनमुक्त हुए — यही शास्त्रों का आदर्श है।#गृहस्थ#संन्यास#आश्रम
हिंदू दर्शनवर्णाश्रम धर्म क्या है आज कितना प्रासंगिकवर्णाश्रम = 4 वर्ण (गुण-कर्म आधारित) + 4 आश्रम (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास)। मूल उद्देश्य: संतुलित जीवन। प्रासंगिक: जीवन चरणों का क्रमिक विकास, श्रम विभाजन। अप्रासंगिक: जन्म आधारित जाति, स्त्री प्रतिबंध। गीता: 'गुणकर्मविभागशः' — गुण-कर्म से, जन्म से नहीं।#वर्णाश्रम#आश्रम#जीवन व्यवस्था