विस्तृत उत्तर
भरद्वाजजी का आश्रम प्रयाग (प्रयागराज) में था — गंगा-यमुना-सरस्वती के त्रिवेणी संगम के निकट।
बालकाण्ड में कहा — 'तहाँ होइ मुनि रिषय समाजा। जाहिं जे मज्जन तीरथराजा॥' अर्थ — तीर्थराज प्रयागमें जो स्नान करने जाते हैं उन ऋषि-मुनियोंका समाज वहाँ (भरद्वाजजीके आश्रममें) जुटता है।
भरद्वाजजी एक महान ऋषि थे जो प्रयाग में रहते थे। माघ मेले के अवसर पर ऋषि-मुनिगण उनके आश्रम में ठहरते, स्नान करते और परस्पर भगवान के गुणों की कथाएँ कहते-सुनते थे। रामचरितमानस में अयोध्याकाण्ड में भी भरत चित्रकूट जाते समय प्रयाग में भरद्वाजजी के आश्रम में रुकते हैं।
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