विस्तृत उत्तर
ईशावास्य उपनिषद (ईशोपनिषद) शुक्ल यजुर्वेद का अंतिम (40वां) अध्याय है। यह एकमात्र उपनिषद है जो सीधे वेद संहिता का भाग है। केवल 18 मंत्र हैं, परंतु इनमें संपूर्ण वेदांत का सार है।
प्रथम मंत्र (1) — उपनिषद का सार
ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्।।'
अर्थ: यह संपूर्ण जगत — जो कुछ भी इस चराचर संसार में है — सब ईश्वर से आच्छादित (व्याप्त) है। त्याग भाव से भोग करो। किसी के धन का लोभ मत करो।
मुख्य संदेश
- 1ईश्वर सर्वव्यापी (मंत्र 1) — प्रत्येक वस्तु, प्राणी, कण में ईश्वर व्याप्त है। कोई स्थान ईश्वर से रहित नहीं।
- 1त्यागपूर्वक भोग (मंत्र 1) — 'तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा' — संसार का भोग करो, परंतु त्याग (non-attachment) के साथ। यह गीता के निष्काम कर्म का मूल स्रोत है। भोगो, परंतु जोड़ो मत; उपयोग करो, परंतु अपना मत समझो।
- 1लोभ निषेध (मंत्र 1) — 'मा गृधः कस्यस्विद्धनम्' — किसी के धन/संपत्ति पर लोभ मत करो। सब ईश्वर का है, किसी का व्यक्तिगत नहीं।
- 1कर्म और ज्ञान का समन्वय (मंत्र 2) — 'कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः' — कर्म करते हुए सौ वर्ष जीने की इच्छा रखो। कर्म त्याज्य नहीं।
- 1विद्या-अविद्या समन्वय (मंत्र 9-11) — केवल अविद्या (कर्मकांड) या केवल विद्या (ज्ञान) — दोनों अधूरे हैं। दोनों का समन्वय आवश्यक।
- 1असतो मा सद्गमय (मंत्र 15-18):
उपनिषद का अंत प्रार्थना से होता है — 'हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्' — सत्य का मुख स्वर्णमय (मोहक) पात्र से ढका है। हे सूर्य/ईश्वर, उस आवरण को हटाओ ताकि मैं सत्य देख सकूं।
गांधी जी ने कहा: 'यदि सारे उपनिषद और हिंदू शास्त्र नष्ट हो जाएं और केवल ईशोपनिषद का प्रथम मंत्र बचे, तो संपूर्ण हिंदू धर्म सुरक्षित रहेगा।'


