विस्तृत उत्तर
यह हिंदू दर्शन का सबसे गंभीर और बहुचर्चित प्रश्न है — 'अहिंसा परमो धर्मः' कहने वाले धर्म में कृष्ण ने युद्ध क्यों करवाया?
1अहिंसा की सही समझ
अहिंसा परमो धर्मः' (महाभारत, शांति पर्व) — यह पूरा श्लोक है: 'अहिंसा परमो धर्मः धर्महिंसा तथैव च।' अर्थात अहिंसा परम धर्म है, परंतु धर्म की रक्षा के लिए हिंसा भी धर्म ही है। अहिंसा कायरता या अन्याय सहना नहीं।
2शांति प्रयास पहले
कृष्ण ने युद्ध से पहले अनेक शांति प्रयास किए (उद्योग पर्व)। संधि दूत बनकर गए, पांडवों के लिए केवल 5 गांव मांगे — दुर्योधन ने 'सुई की नोक बराबर भी भूमि नहीं दूंगा' कहा। सभी शांतिपूर्ण विकल्प समाप्त होने पर ही युद्ध हुआ।
3क्षत्रिय धर्म (गीता 2.31-33)
कृष्ण ने अर्जुन को कहा — 'स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि। धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते।' (2.31) — क्षत्रिय का धर्म अन्याय से लड़ना है। धर्मयुद्ध से बढ़कर क्षत्रिय के लिए कुछ नहीं।
4अन्याय सहना = पाप
द्रौपदी चीरहरण, लाक्षागृह, 13 वर्ष वनवास — ये सब अन्याय थे। अन्याय सहते रहना भी पाप है। कृष्ण ने कहा — अन्याय के विरुद्ध खड़ा न होना कायरता है, अहिंसा नहीं (गीता 2.34-36)।
5धर्म संस्थापन (गीता 4.7-8)
कृष्ण का अवतार ही धर्म स्थापना के लिए था। कौरव = अधर्म; पांडव = धर्म। धर्म-अधर्म का संघर्ष अनिवार्य है।
6आत्मा अमर (गीता 2.19-20)
कृष्ण ने समझाया — 'न हन्यते हन्यमाने शरीरे' — आत्मा अमर है, शरीर मरता है। वास्तविक अर्थ में कोई किसी को मारता नहीं।
सार: कृष्ण ने अहिंसा का उल्लंघन नहीं किया — उन्होंने 'धर्म रक्षार्थ हिंसा' (righteous resistance) का मार्ग दिखाया। अन्याय के समक्ष चुप रहना सबसे बड़ी हिंसा है।





