श्रीविष्णु महापुराण (प्रथम अंश: द्वितीय अध्याय) का विशद भाष्य: प्रधान, पुरुष, सांख्य तत्त्व एवं सृष्ट्युद्गम
प्रथम खण्ड: मंगलाचरण, सन्दर्भ और परम तत्त्व का स्वरूप
उपोद्घात और वक्ता-श्रोता सन्दर्भ
श्रीविष्णु महापुराण के प्रथम अंश का यह द्वितीय अध्याय सृष्टि के मूल कारणों, अर्थात् प्रधान (प्रकृति) और पुरुष के भेद तथा समस्त सांख्य तत्त्वों के क्रमवार उद्गम का गहन वर्णन करता है। प्रथम अध्याय की कथा के पश्चात्, मैत्रेय ऋषि ने महर्षि पराशर के समक्ष जगत की उत्पत्ति, स्थिति और लय से संबंधित अनेक गूढ़ प्रश्नों को रखा था। वे परम धर्मात्मा, महर्षि पराशर को ‘वासिष्ठनन्दन’ कहकर सम्बोधित करते हुए, समुद्रों की उत्पत्ति, पर्वतों का अधिष्ठान, सूर्य आदि का परिमाण, देवों के वंश, मनु, मन्वन्तर, कल्पों के विभाग, युगों के धर्म, और प्रलय के स्वरूप सहित समस्त विषयों को सुनने की तीव्र इच्छा व्यक्त करते हैं।
महर्षि पराशर सृष्टि की इस प्रक्रिया के वर्णन से पूर्व, इस ज्ञान की पवित्र परंपरा को स्थापित करते हैं। वे बताते हैं कि यह सम्पूर्ण विषयवस्तु सर्वप्रथम लोकपितामह ब्रह्माजी ने दक्ष तथा अन्य ऋषियों को प्रदान की थी। तत्पश्चात्, यह ज्ञान परम्परा से होते हुए राजा पुरुकुत्स को, फिर सारस्वत ऋषि को प्राप्त हुआ, और सारस्वत ऋषि से उन्हें (पराशर) प्राप्त हुआ है। इस प्रकार, यह सृष्टि-प्रक्रिया का वर्णन एक अत्यंत प्राचीन, शुद्ध और प्रामाणिक स्रोत पर आधारित है, जिसका मूल कारण स्वयं ब्रह्माजी हैं।
परम तत्त्व (विष्णु) का एकात्म स्वरूप
इस विस्तृत सृष्टि-प्रक्रिया के वर्णन का प्रारम्भ करने से पूर्व, महर्षि पराशर उस परम तत्त्व का स्वरूप स्थापित करते हैं, जो सम्पूर्ण जगत का अधिष्ठान, कारण और चरम लक्ष्य है। यह परम तत्त्व ही भगवान विष्णु हैं। विष्णु के स्वरूप को दो मुख्य भागों में देखा जाता है: उनका निर्गुण, उपाधिरहित स्वरूप और उनका सगुण, विश्वरूप।
विष्णु का निर्गुण और शुद्ध स्वरूप
परमेश्वर विष्णु को अविकारी, शुद्ध, अविनाशी, सदैव एकरूप, सर्वजयी और वासुदेव नाम से अभिहित किया गया है । उनका यह स्वरूप समस्त उपाधियों, भेदों और परिवर्तनों से रहित है। वे अत्यंत सूक्ष्म से भी सूक्ष्म हैं, समस्त प्राणियों के भीतर स्थित रहने वाले परम सत्पुरुष हैं, और नित्य तथा अविनाशी हैं। यद्यपि वे शुद्ध ज्ञान के स्वरूप हैं, तथापि अज्ञान के कारण वे अनेक भिन्न-भिन्न पदार्थों के रूप में प्रतीत होते हैं।
परमेश्वर का त्रिधा-विभाजन: सृष्टि, स्थिति, संहार
वह एक ही भगवान जनार्दन हैं, जो जगत की उत्पत्ति (सृष्टि), स्थिति (पालन) और संहार (लय) के प्रयोजनार्थ, क्रमशः ब्रह्मा, विष्णु और शिव (शंकर) इन तीन भिन्न संज्ञाओं को धारण करते हैं। यह त्रिविध कार्य उनकी लीला मात्र है, जिसमें वे स्वयं ही कर्ता, कर्म और करण बन जाते हैं।
- ब्रह्म रूप (सृष्टि): वे प्रभु विष्णु स्वयं ब्रह्मा का रूप धारण करके अपनी ही सृष्टि करते हैं।
- विष्णु रूप (स्थिति): वे पालक विष्णु होकर बाल्य रूप (अर्थात् जो जगत् बालित है) अपना ही पालन करते हैं।
- शिव/रुद्र रूप (संहार): और अंत में, वे स्वयं ही संहारक शिव (या तमःप्रधान अति भयंकर रुद्र रूप) का धारण करते हैं और स्वयं ही उपसहत (लीन होने वाला जगत्) होते हैं।
यह वर्णन उस गहन दार्शनिक सत्य को स्थापित करता है कि परमेश्वर ही ब्रह्मादि अवस्थाओं द्वारा रचने वाले हैं, वे ही रचे जाते हैं; वे ही पालते हैं, वे ही पालित हैं; वे ही संहार करते हैं, और स्वयं ही संहृत होते हैं। सम्पूर्ण जगत, जिसमें पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, समस्त इन्द्रियाँ और अंतःकरण आदि सम्मिलित हैं, वह सब-का-सब पुरुष रूप है, क्योंकि अव्यय विष्णु ही विश्वरूप हैं और वे ही सब भूतों के अंतरात्मा हैं। इस प्रकार, ब्रह्मादि प्राणियों में स्थित सर्गादिक (सृष्टि आदि की क्रियाएँ) भी उन्हीं परमेश्वर के उपकारक हैं।
सांख्य का परमेश्वरवादी आधार
यह महत्वपूर्ण है कि विष्णु पुराण सांख्य दर्शन के तत्त्वों का उपयोग करते हुए भी, उन्हें पूर्णतः परमेश्वर की इच्छा और शक्ति के अधीन रखता है। जहाँ उत्तरवर्ती सांख्य परंपरा निरीश्वरवादी मानी जाती है और प्रकृति को स्वतंत्र मानती है, वहीं यह पुराण स्पष्ट करता है कि प्रकृति (प्रधान) की क्रियाशीलता परमेश्वर विष्णु के अधिष्ठान के बिना सम्भव नहीं है।
यह सिद्धान्त स्थापित करता है कि जगत के समस्त भौतिक (महाभूत) और मानसिक (इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, अहंकार) तत्त्व—जो कि सांख्य की संरचना है—वे सभी भगवान विष्णु की ही शक्ति की अभिव्यक्ति मात्र हैं। यह सुनिश्चित करता है कि प्रकृति (प्रधान) सृष्टि करने में स्वतंत्र नहीं है, बल्कि वह परमेश्वर की इच्छा और चेतना से अनुप्राणित होकर ही कार्य करती है। इस प्रकार, इस सृष्टि-प्रक्रिया का अध्ययन भक्तिमय आधार पर होता है, जहाँ सांख्य की कार्य-कारण श्रृंखला परम तत्त्व के महिमा गान का साधन बनती है।
परमेश्वर के चार रूप और काल की नियामक भूमिका
परम तत्त्व विष्णु के चार प्रमुख रूप माने गए हैं, जो सृष्टि की प्रक्रिया को संचालित करते हैं:
- परम स्वरूप: उपाधिरहित, शुद्ध ज्ञानमय।
- प्रधान (प्रकृति): अव्यक्त, त्रिगुणात्मक कारण।
- पुरुष (क्षेत्रज्ञ): चेतन तत्त्व, भोक्ता।
- काल: वह शक्ति जो गति प्रदान करती है।
इन चार रूपों में, भगवान विष्णु का काल रूप अत्यंत नियामक और निर्णायक होता है। काल केवल एक समय मापन नहीं है, बल्कि वह सर्वोच्च प्रेरक बल है जो प्रधान और पुरुष की जड़ता या निष्क्रिय साम्यावस्था को भंग करता है। काल को अनादि और अनंत कहा गया है, और इसी के कारण संसार की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय (संहार) निरंतर प्रवाहरूप से होते रहते हैं। यह काल ही जड़ प्रधान को सक्रिय करने का दैवीय मुहूर्त है। विष्णु का परमधाम इन चारों तत्त्वों (प्रधान, पुरुष, व्यक्त, और काल) से भी परे स्थित है, यद्यपि ये चारों ही उनके पृथक रूप हैं और जगत की उत्पत्ति, स्थिति और संहार के कारण हैं।
द्वितीय खण्ड: प्रधान (प्रकृति), पुरुष और काल का तात्त्विक विवेचन
सृष्टि के वास्तविक उद्गम को समझने के लिए, महर्षि पराशर ने प्रधान (प्रकृति) और पुरुष के स्वरूप तथा उनके परस्पर भेद का विशद व्याख्यान किया है, जो सांख्य दर्शन की आधारशिला है।
प्रधान तत्त्व (अव्यक्त प्रकृति) का सूक्ष्म स्वरूप
प्रधान वह मूल कारण शक्ति है जो जगत की उत्पत्ति से पूर्व अव्यक्त अवस्था में रहती है । इसी को महर्षिगण ‘सूक्ष्म प्रकृति’ भी कहते हैं।
प्रधान के गुण और लक्षण
- सद्-असद् स्वरूप: प्रधान वह अव्यक्त कारण शक्ति है जो एक ही समय में सद् (कार्य रूप में विद्यमान) और असद् (कारण रूप में अव्यक्त) दोनों रूपों में विद्यमान रहती है।
- अविनाशी और निरवलम्ब: यह प्रधान अविनाशी है, किसी अन्य आधार (सपोर्ट) पर स्थित नहीं है, यह अजर (वृद्धावस्था से रहित), अपरिमित (मापन से परे), और अविकारी है।
- गुण-त्रय: यह प्रधान तत्त्व सत्त्व, रजस और तमस—इन तीन गुणों से युक्त है। प्रलयकाल में ये तीनों गुण पूर्ण साम्यावस्था (संतुलन) में स्थित रहते हैं, जिससे प्रधान निष्क्रिय होकर स्थित रहता है।
- अनादि कारण: प्रधान जगत का कारण है, किन्तु स्वयं अनादि है। यह नित्य है और सदैव एकरूप रहती है।
- लक्षणों का अभाव: प्रधान शब्द, स्पर्श, रूप, रस, और गंध से रहित तथा आकारहीन है। इसका ज्ञान केवल अनुमान से ही किया जा सकता है, क्योंकि यह इन्द्रियों द्वारा अनुभव के योग्य नहीं है।
पुरुष (क्षेत्रज्ञ) का तात्त्विक स्वरूप
पुरुष वह चेतन तत्त्व है, जो प्रधान के गुणों के संयोग से उत्पन्न होने वाले सुख-दुःख आदि का साक्षी और भोक्ता है।
- पृथक स्थिति: पुरुष प्रधान तत्त्व से पृथक (अलग) स्थित होता है।
- क्षेत्रज्ञ रूप: परम ब्रह्म का जो स्वरूप जीवात्मा के रूप में स्थित होता है और शरीर (क्षेत्र) को जानता है, उसे ही ‘पुरुष’ या ‘क्षेत्रज्ञ’ कहा जाता है।
- सृष्टि में भूमिका: सांख्य में पुरुष को निष्क्रिय द्रष्टा माना जाता है, किन्तु विष्णु पुराण में उसे सृष्टि के लिए आवश्यक माना गया है क्योंकि गुणों की साम्यावस्थारूप प्रधान, विष्णु के 'क्षेत्रज्ञरूप' से अधिष्ठित होकर ही महत्तत्त्व को जन्म दे पाता है।
सृष्टि हेतु क्षोभन: जड़ता और चैतन्य का समन्वय
सृष्टि की प्रक्रिया तब प्रारम्भ होती है जब जड़ प्रधान और चेतन पुरुष को प्रेरित किया जाता है। यह प्रेरणा परमेश्वर विष्णु के काल रूप द्वारा सम्पन्न होती है।
प्रेरणा का क्षण और विधि
जब सर्गकाल (सृष्टि का समय) उपस्थित होता है, तब परब्रह्म परमात्मा, जो विश्वरूप, सर्वव्यापी और सर्वात्मा हैं, अपनी इच्छा से प्रधान और पुरुष को क्षोभित करते हैं। यह 'क्षोभन' ही गुणों की साम्यावस्था को भंग करता है और सृष्टि के लिए आवश्यक गति प्रदान करता है।
परमेश्वर की यह प्रेरणा किसी क्रियात्मक प्रयास से नहीं होती, बल्कि केवल अपनी सन्निधिमात्र (उपस्थिति मात्र) से होती है। इस प्रक्रिया को समझने के लिए गंध का दृष्टांत दिया गया है: जिस प्रकार गंध स्वयं क्रियाशील न होने पर भी, केवल अपनी उपस्थिति के कारण ही मन को क्षुब्ध (प्रभावित) कर देती है, उसी प्रकार परमेश्वर भी अपनी सन्निधिमात्र से ही प्रधान और पुरुष को सृष्टि के लिए प्रेरित करते हैं।
क्षोभक और क्षुब्ध का एकत्व
इस दैवीय क्रिया के माध्यम से, यह स्थापित होता है कि परमेश्वर (पुरुषोत्तम) ही वह शक्ति हैं जो क्षोभित करने वाले (क्षोभक) हैं, और वे ही तत्त्व (प्रधान और पुरुष) हैं जो क्षुब्ध होने वाले हैं। परमेश्वर ही संकोच (साम्य) और विकास (क्षोभ) युक्त 'प्रधानरूप' से भी स्थित हैं।
यह दार्शनिक निष्कर्ष जड़ता (प्रधान) और चैतन्य (पुरुष) के समन्वय की आवश्यकता को हल करता है। शास्त्रीय दृष्टिकोण से, जड़ पदार्थ स्वयं कार्य प्रारम्भ नहीं कर सकता, और अविकारी चैतन्य तत्त्व कार्य में प्रवृत्त नहीं हो सकता। विष्णु पुराण इस कठिनाई को परमेश्वर के क्षेत्रज्ञरूप के अधिष्ठान (अधिष्ठाता) द्वारा हल करता है। परमात्मा का क्षेत्रज्ञरूप (पुरुष) प्रधान (क्षेत्र) पर अधिष्ठित होता है, और काल उस अधिष्ठान में गति प्रदान करता है। यह त्रिक-कारक संयोजन (प्रधान $+$ पुरुष $+$ काल) सृष्टि को आरम्भ करने के लिए अनिवार्य है। इस प्रकार, पुरुष केवल साक्षी नहीं, बल्कि सृष्टि का अप्रत्यक्ष उत्प्रेरक सिद्ध होता है।
तृतीय खण्ड: सांख्य तत्त्वों का क्रमवार उद्गम (सृष्टि-क्रम)
प्रधान के गुणों की साम्यावस्था भंग होने और विष्णु के क्षेत्रज्ञरूप द्वारा अधिष्ठित होने के फलस्वरूप, अव्यक्त तत्त्वों से व्यक्त सृष्टि का क्रम आरम्भ होता है।
महत्तत्त्व (बुद्धि) की उत्पत्ति
सृष्टि क्रम में पहला विकार (उत्पन्न तत्त्व) महत्तत्त्व है। सर्गकाल के प्राप्त होने पर, गुणों की साम्यावस्थारूप प्रधान जब विष्णु के क्षेत्रज्ञरूप से अधिष्ठित होता है, तो उससे सर्वप्रथम महत्तत्त्व की उत्पत्ति होती है।
स्वरूप और कार्य: महत्तत्त्व को 'बुद्धि तत्त्व' भी कहा जाता है। यह वह प्रथम शक्ति है जो अव्यक्त कारण से व्यक्त कार्य को जानने और निश्चित करने (निश्चय और संकल्प) की क्षमता रखती है।
त्रिविध स्वरूप: उत्पन्न हुआ यह महान् (महत्तत्त्व) स्वयं प्रधानतत्त्व से आवृत्त होता है और यह अपनी गुण-प्रधानता के कारण तीन प्रकार का होता है: सात्त्विक, राजस और तामस।
त्रिविध अहंकार की उत्पत्ति और विभाजन
महत्तत्त्व से अगला विकार अहंकार है। जिस प्रकार बीज छिलके से समान रूप से ढँका रहता है, उसी प्रकार त्रिविध महत्तत्त्व से ही तीन प्रकार के अहंकार उत्पन्न होते हैं। अहंकार ‘मैं हूँ’ की वह भावना है जो आत्मा को प्रकृति से जोड़ती है और जगत के भोग का कारण बनती है।
स्वरूप: यह अहंकार स्वयं त्रिगुणात्मक होता है और महत्तत्त्व से व्याप्त रहता है। यह भौतिक तत्वों (भूत) और इन्द्रियों (ज्ञान/कर्म) दोनों का मूल कारण है।
अहंकार का विभाजन सृष्टिक्रम के संचालन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है:
- वैकारिक अहंकार (सात्त्विक): यह सत्त्व गुण की प्रधानता रखता है। इसका प्रमुख कार्य इन्द्रियों के अधिष्ठाता देवताओं और मन की उत्पत्ति में सहयोग करना है।
- तेजस अहंकार (राजस): यह रजस गुण की प्रधानता रखता है। रजस का अर्थ है क्रिया, ऊर्जा या गति। यह स्वयं किसी अंतिम तत्त्व की रचना नहीं करता, बल्कि वैकारिक (सात्त्विक) और भूतादि (तामस) दोनों अहंकार को सक्रिय करने में उत्प्रेरक (मोटिव फोर्स) का कार्य करता है।
- भूतादि अहंकार (तामस): यह तमस गुण की प्रधानता रखता है। यह जड़त्व और क्षमता का स्रोत है। यह विकृत होकर सूक्ष्म तत्वों (पंचतन्मात्राओं) और पंचमहाभूतों की रचना का मूल कारण बनता है।
अहंकार की यह त्रिविध गतिशीलता यह स्पष्ट करती है कि सृजन के लिए तीन विशिष्ट ऊर्जाएँ एक साथ कार्य करती हैं: वैकारिक (ज्ञान/सात्त्विक), तेजस (क्रिया/राजस), और भूतादि (क्षमता/तामस)। राजस (तेजस अहंकार) ही वह सेतु है जो मानसिक संरचनाओं और भौतिक तत्वों के बीच आवश्यक क्रियाशक्ति का संचार करता है।
एकादश इन्द्रियों का प्राकट्य
दस इन्द्रियाँ और मन (ग्यारहवाँ) तेजस (राजस) और वैकारिक (सात्त्विक) अहंकार के सहयोग से उत्पन्न होते हैं।
ज्ञानेन्द्रियाँ (बुद्धि की सहायक)
ये पाँच इन्द्रियाँ सत्त्वगुण (वैकारिक) की सहायता से बुद्धि के समीप रहकर शब्दादि विषयों को ग्रहण करती हैं।
- श्रोत्र (कान): शब्द ग्रहण करने वाली।
- त्वक् (त्वचा): स्पर्श ग्रहण करने वाली।
- चक्षु (नेत्र): रूप ग्रहण करने वाली।
- जिह्वा (जीभ): रस ग्रहण करने वाली।
- नासिका (नाक): गंध ग्रहण करने वाली।
कर्मेन्द्रियाँ (क्रिया की सहायक)
ये पाँच इन्द्रियाँ क्रियात्मक कार्य करती हैं, जो रजस गुण (तेजस) से प्रेरित होती हैं।
- वाक् (वाणी): वचन बोलना।
- हस्त (पाणि): ग्रहण करना, शिल्प करना।
- पाद: गति (चलना)।
- पायु (गुदा): मल-मूत्र का त्याग।
- उपस्थ (लिंग): प्रजनन और विसर्जन।
मनस और अधिष्ठाता देवता
मन ग्यारहवाँ तत्त्व है। यह उभयात्मक (ज्ञानात्मक और क्रियात्मक) होता है। यह वैकारिक (सात्त्विक) और तेजस (राजस) दोनों के सहयोग से उत्पन्न होता है और संकल्प तथा विकल्प (संशय और निश्चय का विचार) का कार्य करता है।
इसके अतिरिक्त, समस्त इन्द्रियों के अधिष्ठाता देवता वैकारिक (सात्त्विक) अहंकार से उत्पन्न हुए कहे जाते हैं। यह स्थापित करता है कि इन्द्रिय केवल भौतिक उपकरण नहीं है, बल्कि एक चेतन शक्ति द्वारा संचालित होती है (जैसे चक्षु का अधिष्ठाता सूर्य है)।
सृष्टि में एकादश इन्द्रियों की उत्पत्ति और उनके कार्यों का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित सारणी में प्रस्तुत है।
सारणी २: एकादश इन्द्रियाँ और अहंकार का समन्वय
| इन्द्रिय का प्रकार | इन्द्रियों के नाम | उत्पत्ति में सहायक अहंकार | कार्य एवं विषय |
|---|---|---|---|
| ज्ञानेन्द्रियाँ | श्रोत्र, त्वक्, चक्षु, जिह्वा, नासिका | वैकारिक (सत्त्व) और तेजस (रजस) | शब्दादि विषयों (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध) का ज्ञान ग्रहण करना। |
| कर्मेन्द्रियाँ | वाक्, पाणि (हस्त), पाद, पायु, उपस्थ | वैकारिक (सत्त्व) और तेजस (रजस) | वचन, शिल्प, गति, मल-त्याग, प्रजनन/विसर्जन। |
| मनस | मन | वैकारिक (सत्त्व) और तेजस (रजस) | संकल्प, विकल्प (उभयात्मक स्वरूप), निर्णय का विचार। |
| अधिष्ठाता | - | वैकारिक (सत्त्व) | इन्द्रियों को चेतन शक्ति प्रदान करने वाले देवता। |
चतुर्थ खण्ड: पंचतन्मात्राएँ और पंचमहाभूतों का सूक्ष्म से स्थूल विकास
जब वैकारिक अहंकार से इन्द्रियाँ उत्पन्न होती हैं, ठीक उसी समय भूतादि (तामस) अहंकार से सूक्ष्म तत्वों (तन्मात्राओं) और तत्पश्चात् स्थूल तत्वों (महाभूतों) की क्रमवार उत्पत्ति होती है। यह प्रक्रिया अत्यंत क्रमबद्ध और संचयी (Cumulative) होती है।
तामस अहंकार का विकृत स्वरूप और तन्मात्रा-सर्ग
तामस अहंकार (भूतादि) विकृत होकर सर्वप्रथम शब्द-तन्मात्रा की रचना करता है। यह तन्मात्रा-सर्ग कहलाता है, जो स्थूल जगत (महाभूत-सर्ग) का आधार है। तन्मात्राओं को सूक्ष्म गुण भी कहते हैं क्योंकि वे स्थूल इंद्रियों द्वारा सीधे अनुभव नहीं किए जा सकते।
तन्मात्राओं का अविशेष स्वरूप
महर्षि पराशर बताते हैं कि जिन तत्वों की केवल तन्मात्रा (सूक्ष्म गुण) ही होती है, वे तन्मात्रा कहे गए हैं। इनमें विशेष भाव नहीं है, इसलिए उनकी अविशेष संज्ञा है।
यह समझना आवश्यक है कि अविशेष क्यों? क्योंकि ये तन्मात्राएँ शांत (सुख), घोर (दुःख), अथवा मूढ़ (मोह/जड़ता) नहीं होती हैं। अर्थात, उनका सुख, दुःख या मोह रूप से अनुभव नहीं हो सकता। यह दर्शाता है कि अनुभूति का त्रिविध स्वरूप (शांत/घोर/मूढ़) केवल स्थूल पदार्थों (महाभूतों) में ही आता है, जब वे इन्द्रियों के संपर्क में आते हैं।
पंचमहाभूतों का क्रमवार उद्गम एवं आवरण सिद्धांत
सृष्टि का यह क्रम 'विकृति' के माध्यम से एक सूक्ष्म गुण से अगले सूक्ष्म गुण और तत्पश्चात् स्थूल भूत की उत्पत्ति को दर्शाता है। प्रत्येक नया महाभूत अपने पूर्ववर्ती तत्वों के गुणों को भी अपने में धारण करता है। यह प्रक्रिया आवरण सिद्धांत पर कार्य करती है, जहाँ प्रत्येक कारण तत्त्व अपने कार्य तत्त्व को आवृत करता है।
-
आकाश तत्त्व:
उत्पत्ति: तामस अहंकार (भूतादि) ने विकृत होकर शब्द-तन्मात्रा (सूक्ष्म ध्वनि) को रचा, और उस शब्द-तन्मात्रा से शब्द-गुण वाला आकाश (ईथर) उत्पन्न हुआ।
आवरण: उत्पन्न हुए शब्द-तन्मात्रारूप आकाश को भूतादि तामस अहंकार ने व्याप्त किया। -
वायु तत्त्व:
उत्पत्ति: फिर शब्द-तन्मात्रारूप आकाश ने विकृत होकर स्पर्श-तन्मात्रा को रचा। उस स्पर्श-तन्मात्रा से बलवान वायु उत्पन्न हुआ, जिसका गुण स्पर्श माना गया है।
आवरण: स्पर्श-तन्मात्रा वाले वायु को शब्द-तन्मात्रारूप आकाश ने आवृत किया। -
तेज (अग्नि) तत्त्व:
उत्पत्ति: फिर स्पर्श-तन्मात्रारूप वायु ने विकृत होकर रूप-तन्मात्रा की सृष्टि की। रूप-तन्मात्रायुक्त वायु से तेज (अग्नि) उत्पन्न हुआ है, जिसका गुण रूप (प्रकाश/रंग) कहा जाता है।
आवरण: रूप-तन्मात्रा वाले तेज को स्पर्श-तन्मात्रा वायु ने आवृत किया। -
जल तत्त्व:
उत्पत्ति: फिर रूप-तन्मात्रामय तेज ने भी विकृत होकर रस-तन्मात्रा की रचना की। उस रस-तन्मात्रारूप से रस-गुण वाला जल उत्पन्न हुआ।
आवरण: रस-तन्मात्रा वाले जल को रूप-तन्मात्रामय तेज ने आवृत किया। -
पृथ्वी तत्त्व:
उत्पत्ति: अंततः, रस-तन्मात्रारूप जल ने विकार को प्राप्त होकर गंध-तन्मात्रा की सृष्टि की, जिससे पृथ्वी उत्पन्न हुई है, जिसका गुण गंध माना जाता है।
आवरण: गंध-तन्मात्रा वाली पृथ्वी को रस-तन्मात्रारूप जल ने आवृत किया।
गुणों की संचयी प्रकृति
आवरण का यह सिद्धांत पंचमहाभूतों में गुणों की संचयी प्रकृति की व्याख्या करता है। यदि आकाश में केवल शब्द गुण है, और वायु को आकाश ने आवृत किया है, तो वायु में शब्द और स्पर्श दोनों गुण विद्यमान होते हैं। यह सिद्धांत बताता है कि प्रत्येक स्थूल भूत अपने पूर्ववर्ती सूक्ष्म भूत के गुणों को भी अपने में धारण करता है।
इस प्रकार पंचमहाभूतों के गुणों का क्रम सिद्ध होता है: आकाश (एक गुण: शब्द), वायु (दो गुण: शब्द, स्पर्श), तेज (तीन गुण: शब्द, स्पर्श, रूप), जल (चार गुण: शब्द, स्पर्श, रूप, रस), और पृथ्वी (पाँच गुण: शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध)। पृथ्वी सबसे स्थूल और सबसे अधिक गुण वाली है, जो सम्पूर्ण सृष्टि के भौतिक जगत की जटिलता का दार्शनिक आधार है।
पंचतन्मात्रा और महाभूतों के उद्गम का क्रमबद्ध विवरण निम्न सारणी में दिया गया है:
सारणी १: सांख्य तत्त्वों का क्रमवार उद्गम और स्वरूप
| क्रमांक | उत्पन्न तत्त्व | कारण (जिससे उत्पन्न हुआ) | अहंकार भेद से संबंध | गुण/लक्षण | विशेष/अविशेष |
|---|---|---|---|---|---|
| 1 | शब्द तन्मात्रा | भूतादि (तामस) | तामस | सूक्ष्म ध्वनि, शुद्ध गुण | अविशेष |
| 2 | आकाश (भूत) | शब्द तन्मात्रा | - | शब्द गुण | विशेष (स्थूल) |
| 3 | स्पर्श तन्मात्रा | शब्द तन्मात्रायुक्त आकाश | तामस | सूक्ष्म स्पर्श | अविशेष |
| 4 | वायु (भूत) | स्पर्श तन्मात्रा | - | शब्द, स्पर्श गुण | विशेष (संचयी) |
| 5 | रूप तन्मात्रा | स्पर्श तन्मात्रारूप वायु | तामस | सूक्ष्म रूप/तेज | अविशेष |
| 6 | तेज/अग्नि (भूत) | रूप तन्मात्रा | - | शब्द, स्पर्श, रूप गुण | विशेष (संचयी) |
| 7 | रस तन्मात्रा | रूप तन्मात्रामय तेज | तामस | सूक्ष्म रस | अविशेष |
| 8 | जल (भूत) | रस तन्मात्रा | - | शब्द, स्पर्श, रूप, रस गुण | विशेष (संचयी) |
| 9 | गंध तन्मात्रा | रस तन्मात्रारूप जल | तामस | सूक्ष्म गंध | अविशेष |
| 10 | पृथ्वी (भूत) | गंध तन्मात्रा | - | पंचभूतों के सभी गुण | विशेष (स्थूलतम) |
पंचम खण्ड: तत्त्वों का संघात, सृष्टि की पूर्णता और ब्रह्मा की उत्पत्ति
महत्तत्त्व से लेकर पृथ्वी तक के समस्त चौबीस तत्त्वों की उत्पत्ति हो जाने के बाद भी, सृष्टि का कार्य तत्काल पूर्ण नहीं हुआ। इन तत्वों में जड़ता थी, और वे स्वयं ब्रह्माण्ड की रचना करने में असमर्थ थे।
तत्त्वों का अपूर्णत्व और संघात की आवश्यकता
उत्पन्न हुए समस्त तत्त्व—महत्तत्त्व, अहंकार, पंचतन्मात्राएँ, एकादश इन्द्रियाँ और पंचमहाभूत—ये सभी पृथक-पृथक रूप से विद्यमान थे। महर्षि पराशर वर्णन करते हैं कि ये समस्त तत्त्व पृथक-पृथक होकर, एक-दूसरे के बिना कार्य करने में असमर्थ थे, और इसलिए वे ब्रह्माण्ड की रचना करने में शक्तिहीन थे।
यह स्थिति सांख्य दर्शन के नियमों का पालन करती है, जिसके अनुसार जड़ तत्त्व (प्रकृति के विकार) स्वयं क्रियाशील नहीं हो सकते। यदि वे स्वयं संघात (मेल) कर सकते, तो उन्हें किसी बाहरी प्रेरक या चेतना की आवश्यकता नहीं होती। इस जटिल दार्शनिक पहेली को सुलझाते हुए, पुराण यह स्थापित करता है कि जगत की रचना केवल भौतिक या सांख्यीय नियमों से नहीं होती, बल्कि उसमें चेतना (परमेश्वर) का सक्रिय हस्तक्षेप आवश्यक है।
विष्णु की शक्ति द्वारा संघात और ब्रह्माण्ड अण्ड की रचना
जब ये समस्त तत्त्व (महत् से लेकर पृथ्वी तक) परस्पर एकत्र नहीं हो पाए, तब भगवान विष्णु ने अपनी विशेष शक्ति द्वारा उन समस्त तत्वों को प्रेरित किया। यह विष्णु की इच्छाशक्ति ही वह अदृश्य बल थी, जिसने इन पृथक-पृथक तत्वों को एक विशिष्ट प्रयोजन—भोक्ता पुरुष के भोग और मोक्ष के लिए—एक साथ मिलाया।
परमेश्वर के क्षेत्रज्ञरूप से अधिष्ठित और काल रूप से प्रेरित हुए, इन तत्वों ने तब मिलकर विराट ब्रह्माण्ड (ब्रह्माण्ड अण्ड) की रचना की। यह अण्ड महाभूतों से बना हुआ, अत्यंत विशाल और गोलाकार था। इसी विराट अण्ड को 'हिरण्यगर्भ' भी कहा जाता है। यह अण्ड सम्पूर्ण संसार की उत्पत्ति का आश्रय बना।
ब्रह्मा का प्राकट्य और अण्ड का आवरण
उस विराट ब्रह्माण्ड अण्ड के भीतर स्वयं ब्रह्मा (चतुर्मुख), जो लोक पितामह कहे जाते हैं, उत्पन्न हुए। ब्रह्मा का यह स्वरूप वास्तव में भगवान विष्णु का ही राजस रूप है, जो सृष्टि के वास्तविक कार्य (अर्थात् व्यक्त जगत को विस्तार देने) हेतु प्रकट होता है। ब्रह्मा उस अण्ड के भीतर स्थित होकर ही समस्त व्यक्त सृष्टि की रचना करते हैं।
यह ब्रह्माण्ड अण्ड (जिसके भीतर ब्रह्मा स्थित हैं) स्वयं प्रकृति के सात आवरणों से क्रमशः घिरा हुआ है। ये आवरण जल, तेज, वायु, आकाश, तथा महत्तत्त्व तक के तत्वों के, पिछले तत्व से सात गुने बड़े होते हैं। यह आवरण सिद्धांत ब्रह्माण्ड की विशालता और तत्वों की क्रमबद्धता को दर्शाता है, जो सभी अंतिम रूप से प्रधान (प्रकृति) में विलीन हो जाते हैं।
सांख्य के चौबीस तत्त्वों का समुच्चय
विष्णु पुराण के इस अध्याय में प्रधान और पुरुष से लेकर महाभूत तक के जिन तत्वों का वर्णन किया गया है, वे ही सांख्य दर्शन के प्रसिद्ध चौबीस तत्त्वों का निर्माण करते हैं।
- प्रकृति/प्रधान: (मूल कारण)
- पुरुष: (चेतन तत्त्व/क्षेत्रज्ञ)
- महत्तत्त्व: (बुद्धि/पहला विकार)
- अहंकार: (दूसरा विकार)
- पंचतन्मात्राएँ: (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध)
- पंचज्ञानेन्द्रियाँ: (श्रोत्र, त्वक्, चक्षु, जिह्वा, नासिका)
- पंचकर्मेन्द्रियाँ: (वाक्, पाणि, पाद, पायु, उपस्थ)
- मन: (उभयात्मक इन्द्रिय)
- पंचमहाभूत: (आकाश, वायु, तेज, जल, पृथ्वी)
इस प्रकार, सांख्य सृष्टि क्रम का पालन करते हुए, विष्णु पुराण एक विराट अण्ड और उसमें स्थित ब्रह्मा को जन्म देता है। यह इस बात पर बल देता है कि चाहे वह सूक्ष्म प्रधान हो या स्थूल ब्रह्माण्ड, सभी अंततः एक ही परमेश्वर की अभिव्यक्ति हैं, जो सृष्टिकर्ता (ब्रह्मा), पालक (विष्णु) और संहारक (शिव) के रूप में अपनी लीला करते हैं।
षष्ठ खण्ड: दार्शनिक सार और उपसंहार
विष्णु की सर्वव्यापकता (विश्वरूपत्व)
महर्षि पराशर इस अध्याय का निष्कर्ष निकालते हुए उस परम सत्य को पुनः स्थापित करते हैं, जिससे वर्णन का प्रारम्भ हुआ था। पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश—ये पंचमहाभूत—तथा समस्त इन्द्रियाँ और अंतःकरण (बुद्धि, मन, अहंकार) आदि जितना भी जगत है, वह सब-का-सब पुरुष रूप है।
यह स्थापित होता है कि अविनाशी विष्णु ही विश्व रूप हैं और वे ही सब भूतों के अंतरात्मा हैं। इस अवधारणा का निहितार्थ यह है कि ब्रह्मादि प्राणियों में स्थित सृष्टि, स्थिति, और संहार की समस्त क्रियाएँ भी उन्हीं परमेश्वर के लिए होती हैं, अर्थात् वे सभी क्रियाएँ परमेश्वर की इच्छा का अनुसरण करती हैं।
वे सर्व स्वरूप, श्रेष्ठ वरदायक, और वरण्य (पूजनीय) भगवान विष्णु ही हैं, जो ब्रह्मा आदि अवस्थाओं को धारण करके:
- सृष्टि करते हैं और स्वयं ही रचे जाते हैं।
- पालन करते हैं और स्वयं ही पालित होते हैं।
- संहार करते हैं और स्वयं ही संहृत होते हैं।
इस प्रकार, भगवान जनार्दन ही अपनी योगमाया से त्रिगुणात्मक प्रकृति के द्वारा स्वयं को अनेक रूपों में अभिव्यक्त करते हैं और जगत का चक्र अनादि काल से चलाते रहते हैं।
सृष्टि और प्रलय का चक्रीय प्रवाह
काल तत्त्व की सर्वोच्चता के कारण, सृष्टि कोई एकल घटना नहीं है, बल्कि एक शाश्वत, आवर्ती प्रक्रिया है। काल अनादि और अनंत है, जिसके कारण उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय (संहार) निरंतर प्रवाहरूप से होते रहते हैं। जब प्रलयकाल में व्यक्त प्रपंच प्रकृति में लीन होता है (प्राकृत प्रलय), तब प्रधान गुणों की साम्यावस्था में स्थित होता है। सर्गकाल के आते ही, यह साम्यावस्था भंग होती है, और तत्वों का उद्गम चक्र पुनः आरम्भ हो जाता है।
यह चक्रीय प्रक्रिया उस परमार्थिक सत्य को दर्शाती है कि जगत केवल नाम-रूपों का अस्थाई प्रदर्शन है, जिसका मूल कारण और अंतिम आश्रय केवल अविनाशी, नित्य, शुद्ध ज्ञानस्वरूप भगवान विष्णु ही हैं।
द्वितीय अध्याय का निष्कर्ष
विष्णु पुराण का प्रथम अंश, द्वितीय अध्याय, सांख्य दर्शन के मूलभूत ढाँचे (प्रधान, पुरुष, 24 तत्त्व) को परमेश्वरवादी सिद्धांत में समाहित करता है। यह अध्याय द्विज मैत्रेय को यह ज्ञान प्रदान कर, उन्हें सृष्टि के मूलभूत तत्त्वों की क्रमबद्धता और अंततः परम विष्णु तत्त्व की अनन्त महिमा का बोध कराता है, जिससे वे परमार्थ मार्ग पर दृढ़ हो सकें। यह सृष्टि-प्रक्रिया जीवात्मा को यह समझने में सहायता करती है कि जिस भौतिक और मानसिक जगत् का वह अनुभव करता है, वह सब-का-सब त्रिगुणात्मक होते हुए भी, परमेश्वर की ही शक्ति से अनुप्राणित है, और मोक्ष का मार्ग इसी सत्य के ज्ञान से होकर गुजरता है।






