विस्तृत उत्तर
उपनिषद वेदों का अंतिम और सर्वोच्च भाग हैं — इसीलिए इन्हें 'वेदांत' (वेद + अंत) कहा जाता है। ये हिंदू दर्शन का दार्शनिक/आध्यात्मिक मूल हैं।
'उपनिषद' शब्द का अर्थ
- ▸उप (समीप) + नि (नीचे) + षद् (बैठना) = गुरु के समीप बैठकर प्राप्त गूढ़ ज्ञान।
- ▸अन्य अर्थ — अविद्या को नष्ट करने वाला रहस्यमय ज्ञान।
कितने उपनिषद हैं
- 1मुक्तिकोपनिषद में 108 उपनिषदों की सूची दी गई है — यह सर्वाधिक प्रचलित संख्या है।
- 2कुछ परंपराओं में 200 से अधिक उपनिषदों का उल्लेख मिलता है।
- 3प्रमुख (Principal) उपनिषद — 10 से 13 उपनिषदों पर शंकराचार्य ने भाष्य लिखा — ये सर्वाधिक प्रामाणिक माने जाते हैं।
शंकराचार्य भाष्य वाले प्रमुख उपनिषद (10-11)
- 1ईशावास्य (शुक्ल यजुर्वेद) — ईश्वर सर्वव्यापी, त्यागपूर्वक भोगो।
- 2केन (सामवेद) — ब्रह्म को कौन जानता है?
- 3कठ (कृष्ण यजुर्वेद) — यम-नचिकेता संवाद, आत्मज्ञान।
- 4प्रश्न (अथर्ववेद) — पिप्पलाद मुनि से 6 प्रश्न।
- 5मुंडक (अथर्ववेद) — परा-अपरा विद्या, 'सत्यमेव जयते'।
- 6मांडूक्य (अथर्ववेद) — ॐकार विवेचन, चार अवस्थाएं (जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति, तुरीय)। सबसे छोटा (12 मंत्र) परंतु सबसे गहन।
- 7तैत्तिरीय (कृष्ण यजुर्वेद) — ब्रह्मानंद, पंचकोश विवेचन।
- 8ऐतरेय (ऋग्वेद) — सृष्टि उत्पत्ति, 'प्रज्ञानं ब्रह्म'।
- 9छांदोग्य (सामवेद) — 'तत्त्वमसि' महावाक्य, उद्दालक-श्वेतकेतु संवाद।
- 10बृहदारण्यक (शुक्ल यजुर्वेद) — सबसे बड़ा उपनिषद। 'अहं ब्रह्मास्मि', याज्ञवल्क्य-मैत्रेयी संवाद।
चार महावाक्य (प्रत्येक वेद से एक)
- 1'प्रज्ञानं ब्रह्म' (ऐतरेय — ऋग्वेद)
- 2'अहं ब्रह्मास्मि' (बृहदारण्यक — यजुर्वेद)
- 3'तत्त्वमसि' (छांदोग्य — सामवेद)
- 4'अयमात्मा ब्रह्म' (मांडूक्य — अथर्ववेद)



