विस्तृत उत्तर
वैराग्य = आध्यात्मिक साधना के दो स्तम्भों में से एक (अभ्यास + वैराग्य)। परंतु वैराग्य ≠ संसार-त्याग/घृणा।
शास्त्रीय परिभाषा
योगसूत्र (1.15): 'दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णस्य वशीकारसंज्ञा वैराग्यम्।' — देखे हुए (सांसारिक) और सुने हुए (स्वर्गीय) विषयों से तृष्णा (लालसा) का अभाव = वैराग्य।
योगसूत्र (1.16 — परवैराग्य): 'तत्परं पुरुषख्यातेर्गुणवैतृष्ण्यम्।' — पुरुष (आत्मा) का ज्ञान होने पर प्रकृति के तीनों गुणों (सत्व-रज-तम) से भी वैराग्य = परम वैराग्य।
वैराग्य क्या है
- ▸अनासक्ति: विषयों से जुड़ाव (Attachment) का अभाव — विषयों से घृणा नहीं।
- ▸विवेक-जन्य: बुद्धि-पूर्वक — 'ये विषय अस्थायी हैं, आत्मा शाश्वत' — इस ज्ञान से स्वाभाविक विरक्ति।
- ▸स्वतःस्फूर्त: जबरदस्ती त्यागना ≠ वैराग्य। सहज, प्राकृतिक रूप से विषयों की आकर्षण-शक्ति कम होना = सच्चा वैराग्य।
वैराग्य क्या नहीं
- ▸❌ संसार/परिवार से भागना
- ▸❌ विषयों से घृणा/द्वेष
- ▸❌ जबरदस्ती दमन (Suppression)
- ▸❌ उदासीनता/अवसाद (Depression ≠ वैराग्य)
- ▸❌ कर्तव्य-त्याग
गीता (2.59): 'विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः। रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते।।' — इन्द्रियों को रोकने से विषय छूटते हैं पर रस (लालसा) नहीं। परम (ईश्वर) का दर्शन होने पर रस भी छूट जाता है। यह सच्चा वैराग्य।
वैराग्य के चरण
- 1यतमान: प्रयास-पूर्वक विरक्ति (कठिन)
- 2व्यतिरेक: कुछ विषयों से विरक्त, कुछ से नहीं
- 3एकेन्द्रिय: केवल एक इन्द्रिय की लालसा शेष
- 4वशीकार: सम्पूर्ण विषयों से वशीकार (नियंत्रण) = वैराग्य
- 5परवैराग्य: गुणों से भी वैतृष्ण्य = सर्वोच्च
अभ्यास: वैराग्य = अभ्यास से आता है। गीता (6.35): अभ्यास+वैराग्य = मन नियंत्रण। दोनों साथ-साथ = सफलता।




