विस्तृत उत्तर
हाटक स्वर्ण हाटकी नदी के तेज, वायु और अग्नि के संयोग से बनता है। भगवान शिव और माता भवानी के दिव्य मिलन से हाटकी नदी उत्पन्न होती है। जब वायुदेव, जिन्हें मातरिश्वा कहा गया है, अग्नि को प्रज्वलित करते हैं, तब अग्निदेव चित्रभानु अपनी भयंकर लपटों के साथ हाटकी नदी के तेज का पान करते हैं। परंतु शिव और शक्ति का वह तेज इतना प्रखर और अनंत होता है कि अग्निदेव भी उसे पचा नहीं पाते। तब वे उस तेज को 'सि-सि' की ध्वनि करते हुए बाहर उगल देते हैं। अग्निदेव द्वारा उगला गया वही घनीभूत तेज हाटक नामक अत्यंत देदीप्यमान स्वर्ण में परिवर्तित हो जाता है।
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