विस्तृत उत्तर
कार्तिकेय के जन्म की यह कथा शिव पुराण और स्कंद पुराण में विस्तार से वर्णित है और अत्यंत दिव्य है।
जब देवताओं ने तारकासुर के आतंक से मुक्ति के लिए शिव से पुत्र उत्पत्ति की विनती की, तब शिव जी ने अपना दिव्य तेज एक हवनकुंड में प्रज्वलित किया। यह तेज इतना अद्भुत और अमोघ था कि कोई भी प्राणी इसे धारण करने में असमर्थ था — यहाँ तक कि माता पार्वती भी इसे अपने गर्भ में नहीं समेट सकती थीं।
शिव जी की यह दिव्य शक्ति को अग्निदेव ने कबूतर का रूप धारण करके ग्रहण किया और उसे सुरक्षित स्थान पर ले जाने लगे। परंतु उस तेज का ताप इतना तीव्र था कि अग्निदेव भी इसे सहन नहीं कर सके। तब उन्होंने वह दिव्य तेज माँ गंगा को सौंप दिया। गंगा ने उसे लेकर जाने का प्रयास किया, परंतु उस असाधारण ऊर्जा से गंगाजल उबलने लगा। विवश होकर माँ गंगा ने उस दिव्य तेज को शरवण (सरकंडों का) वन में स्थापित कर दिया। गंगाजल में बहते-बहते वह तेज छह भागों में विभाजित हो गया और शरवण वन में छह सुंदर और तेजस्वी शिशुओं के रूप में प्रकट हुआ। तब कृत्तिका नक्षत्र की छह देवियाँ वहाँ आईं और उन्होंने उन छह शिशुओं को अपने स्तनों से दूध पिलाया। माता पार्वती ने उन छह शिशुओं को एक में मिलाकर एक षड्मुख (छह मुख वाले) पुत्र को प्राप्त किया — यही कार्तिकेय हैं।





