विस्तृत उत्तर
तारकासुर के वध के लिए शिव-पार्वती के पुत्र का होना अनिवार्य था। शिव पुराण और स्कंद पुराण के अनुसार, शिव और पार्वती के विवाह के पश्चात, उनके मिलन से उत्पन्न तेज (छह चिंगारियों) को अग्नि देव ने धारण किया। अग्नि उस असहनीय और प्रचंड तेज को सहन नहीं कर सके और उन्होंने उसे सरवण नदी (गंगा) के ठंडे जल में प्रवाहित कर दिया।
वहाँ शरवण (सरकंडों के वन) में छह तेजस्वी बालकों का जन्म हुआ। उस वन में विहार कर रही छह कृत्तिका कन्याओं ने उन बालकों को अपना स्तनपान कराया और उनका पालन-पोषण किया। जब शिव और पार्वती वहाँ पहुँचे, तो पार्वती के वात्सल्यपूर्ण आलिंगन से वे छहों बालक मिलकर एक शरीर (छह मुख वाले 'षडानन' या कार्तिकेय) बन गए।
बड़े होकर कार्तिकेय जी देवों के सेनापति बने और उन्होंने महापराक्रमी तारकासुर का वध कर देवताओं को पुनः स्वर्ग का आधिपत्य दिलाया। दक्षिण भारत में वे भगवान मुरुगन के नाम से अत्यधिक पूजनीय हैं।





