विस्तृत उत्तर
कार्तिकेय का जन्म तारकासुर नामक असुर के वध के लिए और देवताओं की रक्षा के लिए हुआ था।
स्कंद पुराण और शिव पुराण के अनुसार तारकासुर ने ब्रह्मा जी की कठोर तपस्या करके यह वरदान प्राप्त किया था कि उसका वध केवल शिव के पुत्र के हाथों ही संभव हो। यह वरदान लेते समय तारकासुर ने सोचा था कि शिव तो वैरागी और संन्यासी हैं, उनका कोई पुत्र कभी जन्म नहीं लेगा, इसलिए वह व्यावहारिक रूप से अमर हो जाएगा।
इस वरदान के बाद तारकासुर ने तीनों लोकों में आतंक फैला दिया। उसने स्वर्ग पर अधिकार कर लिया, देवताओं को परास्त किया और धर्म को नष्ट करने लगा। देवता त्राहि-त्राहि करते हुए भगवान विष्णु के पास गए। विष्णु ने उन्हें कैलाश जाकर शिव से पुत्र उत्पन्न करने की विनती करने को कहा।
समस्या यह थी कि माता सती के वियोग में शिव गहरी तपस्या में लीन थे और उनका मन विवाह से विरक्त था। इसी कारण देवताओं ने कामदेव से शिव की तपस्या भंग करवाई, पार्वती ने तप किया, और अंततः शिव-पार्वती का विवाह हुआ। इस पवित्र मिलन से जो दिव्य तेज उत्पन्न हुआ, उससे अग्नि और गंगा के माध्यम से कार्तिकेय का जन्म हुआ। कार्तिकेय ने बड़े होकर तारकासुर का वध किया और देवताओं को उनका स्थान वापस दिलाया।





