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कार्तिकेय कथा⏱ 2 मिनट पठन

कार्तिकेय को छह सिर क्यों हैं?

संक्षिप्त उत्तर

कार्तिकेय को छह सिर इसलिए हैं क्योंकि उनका दिव्य तेज गंगाजल में बहकर छह भागों में विभाजित हो गया था और छह शिशुओं के रूप में प्रकट हुआ। माता पार्वती ने छहों को एक करके षड्मुख पुत्र प्राप्त किया।

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विस्तृत उत्तर

कार्तिकेय को छह सिर इसलिए हैं क्योंकि उनका जन्म उस दिव्य तेज से हुआ था जो गंगाजल में बहकर छह भागों में विभाजित हो गया था और छह अलग-अलग शिशुओं के रूप में प्रकट हुआ था।

पुराणों के अनुसार शिव जी का दिव्य तेज अग्नि से होते हुए गंगा को मिला। जब गंगा उस असाधारण ऊर्जा को शरवण वन में लेकर गईं, तो वह तेज गंगाजल में बहते-बहते छह भागों में विभाजित हो गया। इन छह तेज-अंशों से शरवण वन में कमल के फूलों पर छह तेजस्वी शिशु उत्पन्न हुए।

कृत्तिका नक्षत्र की छह देवियाँ आईं और उन्होंने उन छह शिशुओं को अपना दूध पिलाया। जब माता पार्वती वहाँ पहुँचीं, तो उन्होंने अपनी ममता से उन सभी छह शिशुओं को एक साथ अपने हृदय से लगाया। उनके ऐसा करते ही वे छहों शिशु एक शरीर में समाहित हो गए — लेकिन छहों मुख बने रहे। इस प्रकार छह मुखों वाले षड्मुख अर्थात षण्मुख (तमिल में शण्मुगन) कार्तिकेय का जन्म हुआ।

एक-एक मुख एक-एक कृत्तिका का प्रतीक माना जाता है। संस्कृत ग्रंथ अमरकोश में कार्तिकेय के नामों में 'षडानन' (छह मुख वाला) और 'षण्मुख' का विशेष उल्लेख है।

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