विस्तृत उत्तर
लिंग पुराण के अनुसार: देवताओं ने दैत्यों के यज्ञों में विघ्न डालने के लिए शिव से प्रार्थना की। शिव ने स्वयं एक दिव्य, तेजोमय, गजमुख स्वरूप प्रकट किया, जिसके हाथ में त्रिशूल और पाश था। शिव ने उन्हें विघ्नहर्ता और विघ्नकर्ता दोनों की उपाधि दी।





