विस्तृत उत्तर
गणेश जी के सिर और शनि की दृष्टि की यह कथा मुख्यतः ब्रह्मवैवर्त पुराण में वर्णित है — शिव पुराण में नहीं। दोनों पुराणों में गणेश जी के सिर कटने की अलग-अलग कथाएं हैं।
ब्रह्मवैवर्त पुराण की कथा के अनुसार जब गणेश जी का जन्म हुआ और शिव-पार्वती के घर उत्सव था, तब सभी देवी-देवताओं को आशीर्वाद देने के लिए बुलाया गया। शनिदेव भी कैलाश पर्वत पर आए, परंतु उन्होंने बाल गणेश को आँखें उठाकर नहीं देखा। जब माता पार्वती ने इसका कारण पूछा, तो शनिदेव ने बताया कि उनकी पत्नी ने उन्हें श्राप दिया है कि उनकी दृष्टि जिस पर पड़ेगी उसका अनिष्ट होगा — अतः वे बालक की रक्षा के लिए उसे नहीं देखना चाहते।
माता पार्वती ने कहा कि ईश्वर की इच्छा के बिना कुछ नहीं होता और शनिदेव को निर्भय होकर पुत्र को आशीर्वाद देना चाहिए। माता पार्वती के आग्रह पर जैसे ही शनिदेव ने बाल गणेश को देखा, उनकी तीव्र दृष्टि के प्रभाव से गणेश जी का सिर धड़ से अलग होकर कहीं दूर चला गया। माता पार्वती के विलाप पर विष्णु जी गरुड़ पर सवार होकर गए और एक हाथी का सिर लेकर आए, जिसे गणेश जी के धड़ से जोड़कर वे पुनर्जीवित हुए।




