शनिवार व्रत की संपूर्ण, पारंपरिक एवं प्रामाणिक व्रत-कथा
१. कथा का पारंपरिक प्रारंभ एवं श्रवण प्रसंग
सनातन हिंदू धर्म की पावन और शाश्वत व्रत-परंपरा में शनिवार का व्रत अत्यंत महिमामय, कष्ट-निवारक, लौकिक सुख-समृद्धि प्रदाता और पारलौकिक कल्याणकारी माना गया है। यह व्रत मुख्य रूप से नवग्रहों में कर्मफलदाता, न्याय के अधिपति, भगवान सूर्यनारायण और माता छाया के परम प्रतापी पुत्र श्री शनिदेव को प्रसन्न करने, उनकी वक्र दृष्टि (साढ़ेसाती और ढैया) के कुप्रभावों से रक्षा पाने तथा जीवन में सुख, शांति एवं स्थिरता की प्राप्ति के लिए किया जाता है ।
पारंपरिक मान्यता और व्रत-पुस्तिकाओं के विधान के अनुसार, शनिवार के दिन प्रातःकाल स्नानादि नित्य कर्मों से निवृत्त होकर, स्वच्छ वस्त्र धारण किए जाते हैं। तदुपरांत एक पवित्र वेदी पर कलश स्थापित कर भगवान शनिदेव का आवाहन किया जाता है । लोहे या मिट्टी के पात्र में सरसों का तेल भरकर, उसमें काले तिल, काले उड़द, लोहे की कील और काला वस्त्र अर्पित कर शनिदेव का षोडशोपचार पूजन किया जाता है ।
कथा-श्रवण का पारंपरिक प्रसंग इसी विधिवत पूजा के पश्चात आरंभ होता है। व्रत करने वाले सभी श्रद्धालु जन, चाहे वे स्त्री हों या पुरुष, हाथ में काले तिल, अक्षत (चावल) और पुष्प लेकर अत्यंत श्रद्धा, एकाग्रता और समर्पण भाव से इस पावन कथा का श्रवण करते हैं। पारंपरिक व्रत-पुस्तिकाओं में कथा का आरंभ इष्टदेव, गुरुदेव और शनिदेव के इस पारंपरिक और सिद्ध आवाहन/वंदना के साथ किया जाता है:
"महतारी। देव धनुज ऋषि मुनि सुमिरत नर नारी। विश्वनाथ धरत ध्यान शरण है तुम्हारी। जय जय श्री शनिदेव भक्तन हितकारी। सूरज के पुत्र प्रभु छाया महतारी।।"
उपरोक्त वंदना के पश्चात, कथावाचक या घर का कोई वयोवृद्ध सदस्य अत्यंत भक्तिभाव से उन पावन कथाओं का रसपान कराता है, जो युगों-युगों से पीढ़ी-दर-पीढ़ी गाई और सुनी जा रही हैं। शनिवार व्रत की महिमा को प्रकट करने वाली मुख्य रूप से तीन प्रामाणिक कथाएँ लोक-परंपरा और व्रत-पुस्तिकाओं में प्राप्त होती हैं। इन तीनों कथाओं का पूर्ण, अक्षुण्ण, क्रमबद्ध और विस्तारपूर्वक वर्णन यहाँ प्रस्तुत है, जिसे व्रत के दिन श्रद्धापूर्वक पढ़ा या सुना जाता है。
२. प्रथम प्रामाणिक आख्यान: चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य और श्री शनिदेव का प्रसंग
यह आख्यान शनिवार व्रत की सबसे प्रमुख, विस्तृत और पारंपरिक कथा है। इस कथा में नवग्रहों के विवाद, राजा विक्रमादित्य के अंजाने अहंकार, शनिदेव के भयंकर कोप, राजा के घोर कष्टों, उनके अटूट धैर्य और अंततः शनिदेव की असीम कृपा व क्षमादान का अत्यंत मार्मिक वर्णन है ।
नवग्रहों का विवाद और देवराज इंद्र का धर्मसंकट
प्राचीन काल की बात है, स्वर्गलोक में एक दिन नवग्रहों—भगवान सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु (बृहस्पति), शुक्र, शनि, राहु और केतु—के मध्य एक अत्यंत गहन और गंभीर विवाद उत्पन्न हो गया । विवाद का विषय यह था कि 'हम नवग्रहों में सबसे बड़ा, सबसे शक्तिशाली और सर्वश्रेष्ठ कौन है?' प्रत्येक ग्रह अपने-अपने प्रभाव, अपनी शक्तियों और लोकों पर अपने आधिपत्य का वर्णन करते हुए स्वयं को सर्वश्रेष्ठ सिद्ध करने लगा。
विवाद जब अत्यंत उग्र हो गया और कोई भी ग्रह पीछे हटने को तैयार न हुआ, तो सभी नवग्रह मिलकर देवराज इंद्र के पास गए और उनसे इस विवाद का न्याय करने की प्रार्थना की। देवराज इंद्र नवग्रहों को अपने सम्मुख उपस्थित देखकर और उनके विवाद का विषय सुनकर गहरे धर्मसंकट में पड़ गए । देवराज इंद्र मन ही मन विचार करने लगे कि नवग्रहों में से सभी अत्यंत शक्तिशाली हैं। यदि मैं किसी एक ग्रह को बड़ा बताता हूँ, तो शेष आठ ग्रह रुष्ट हो जाएंगे। और जिस भी ग्रह को मैंने सबसे छोटा बताया, वह रुष्ट होकर मुझे भयंकर शाप दे देगा और मेरा स्वर्ग का राज्य भस्म हो जाएगा ।
अतः देवराज इंद्र ने अत्यंत कूटनीति और विनम्रता से काम लेते हुए हाथ जोड़कर कहा, "हे नवग्रहों! आप सभी वंदनीय हैं और अपने-अपने स्थान पर अत्यंत शक्तिशाली हैं। मैं आप लोगों के इस विवाद का निर्णय करने में सर्वथा असमर्थ हूँ। परंतु मैं आपको एक उचित मार्ग सुझा सकता हूँ। पृथ्वीलोक पर उज्जयिनी (उज्जैन) नगरी में चक्रवर्ती सम्राट राजा विक्रमादित्य राज करते हैं। वे अत्यंत न्यायप्रिय, धर्मज्ञ, सत्यवादी और विवेकशील राजा हैं। उनका न्याय तीनों लोकों में प्रसिद्ध है। आप सभी उनके पास जाएँ, मुझे पूर्ण विश्वास है कि वही इस विवाद का सर्वमान्य और उचित निर्णय करेंगे।"
उज्जयिनी प्रस्थान और नौ सिंहासनों का निर्माण
देवराज इंद्र का परामर्श सभी नवग्रहों को उचित प्रतीत हुआ। तदुपरांत, सभी नवग्रह उज्जयिनी नगरी की ओर प्रस्थान कर गए। उज्जयिनी पहुँचकर नवग्रहों ने राजा विक्रमादित्य के भव्य दरबार में प्रवेश किया। अचानक नवग्रहों को अपने दरबार में उपस्थित देखकर राजा विक्रमादित्य ने तुरंत अपने सिंहासन से उठकर उन्हें साष्टांग प्रणाम किया और आदरपूर्वक बैठाया। राजा ने हाथ जोड़कर उनके आगमन का कारण पूछा。
नवग्रहों ने अपने विवाद का विषय राजा के समक्ष रखा और कहा, "हे राजन! हम नवग्रहों में सबसे बड़ा और सबसे छोटा कौन है, इसका निर्णय आपको करना है। देवराज इंद्र ने हमें आपके पास भेजा है।"
राजा विक्रमादित्य यह सुनकर अत्यंत चिंतित हो उठे । वे भी देवराज इंद्र की भाँति इस समस्या की गंभीरता को समझ गए। राजा ने मन में विचार किया कि देवता तो वैसे भी अत्यंत क्रोधी स्वभाव के होते हैं। मैं एक तुच्छ मानव होकर इनका निर्णय कैसे कर सकता हूँ? जिस किसी ग्रह को भी मैंने छोटा बताया, वही मुझ पर कुपित हो उठेगा और मेरे राज्य का सर्वनाश कर देगा ।
तभी राजा विक्रमादित्य की न्याय-बुद्धि जाग्रत हुई और उन्हें एक अद्वितीय युक्ति सूझी। उन्होंने अपने राज्य के सर्वश्रेष्ठ स्वर्णकारों और कारीगरों को बुलवाया और उन्हें विभिन्न धातुओं के नौ भव्य सिंहासन बनवाने का आदेश दिया। राजा की आज्ञा से रातों-रात नौ सिंहासन तैयार किए गए। ये सिंहासन नवग्रहों की प्रकृति और उनकी प्रिय धातुओं के आधार पर बनाए गए थे। राजा ने इन सिंहासनों को एक विशेष क्रम में सभा-भवन में रखवा दिया—स्वर्ण का सिंहासन सबसे आगे और लोहे का सिंहासन सबसे अंत में रखा गया । पारंपरिक ग्रंथों के अनुसार सिंहासनों का धातु-क्रम इस प्रकार था:
| सिंहासन का क्रम | धातु (Metal) | संबंधित ग्रह (जिन्होंने स्थान ग्रहण किया) |
|---|---|---|
| प्रथम | स्वर्ण (Gold) | भगवान सूर्य |
| द्वितीय | रजत (Silver) | भगवान चंद्र |
| तृतीय | कांस्य (Bronze) | भगवान मंगल |
| चतुर्थ | पीतल (Brass) | भगवान बुध |
| पंचम | सीसा (Lead) | भगवान गुरु (बृहस्पति) |
| षष्ठम | रांगा (Tin) | भगवान शुक्र |
| सप्तम | जस्ता (Zinc) | भगवान राहु |
| अष्टम | अभ्रक (Mica) | भगवान केतु |
| नवम (अंतिम) | लौह (Iron) | भगवान शनिदेव |
तदुपरांत राजा विक्रमादित्य ने नवग्रहों को दरबार में आमंत्रित किया और हाथ जोड़कर विनम्रतापूर्वक निवेदन किया, "हे देवगण! आप सभी परम पूजनीय हैं। मैं आपके बड़प्पन का निर्णय करने वाला कौन होता हूँ? मैंने आप सभी के लिए आपकी प्रिय धातुओं के नौ सिंहासन बनवाए हैं। आप सभी स्वेच्छा से, अपनी-अपनी इच्छा और पद के अनुसार अपने-अपने सिंहासन पर स्थान ग्रहण करें। जो सबसे प्रथम बैठेगा वह सबसे बड़ा और जो सबसे अंतिम सिंहासन पर विराजमान होगा, वह स्वयं ही सबसे छोटा कहलाएगा।"
राजा की यह बात सुनकर नवग्रह अत्यंत प्रसन्न हुए। वे सभी अपने-अपने प्रिय धातु के अनुसार सिंहासनों की ओर बढ़े। भगवान सूर्य स्वर्ण के सिंहासन पर, चंद्र रजत पर, मंगल कांस्य पर बैठे। इसी क्रम में आगे बढ़ते हुए, अंत में शनिदेव, जिन्हें लोहा अत्यंत प्रिय है, सबसे अंत में रखे गए लोहे के सिंहासन पर जाकर बैठ गए ।
जब सभी ग्रह अपने-अपने स्थानों पर विराजमान हो गए, तो राजा विक्रमादित्य ने हाथ जोड़कर कहा, "हे देवगण! मैंने आप में से किसी को भी बड़ा या छोटा नहीं कहा है। आप सभी ने स्वयं अपना-अपना स्थान और धातु चुनी है। अब जो पहले स्थान पर है वह सबसे बड़ा है और जो अंतिम सिंहासन पर विराजमान है, वह सबसे छोटा है।"
शनि देव का भयंकर कोप और चेतावनी
यह सुनकर अन्य आठ ग्रह तो अत्यंत प्रसन्न हुए और राजा विक्रमादित्य की न्याय-बुद्धि की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए स्वर्गलोक को लौट गए । परंतु भगवान शनिदेव वहीं अपने लोहे के सिंहासन पर बैठे रहे। वे तुरंत समझ गए कि राजा विक्रमादित्य ने अत्यंत चतुराई से लोहे का सिंहासन सबसे अंत में रखकर उन्हें सबसे छोटा सिद्ध कर दिया है。
शनिदेव का क्रोध भड़क उठा। उनके नेत्र लाल हो गए और उनकी भृकुटी तन गई। वे राजा विक्रमादित्य को संबोधित करते हुए अत्यंत गर्जनापूर्ण स्वर में बोले, "राजन! तूने मुझे सबसे पीछे बैठाकर मेरा घोर अपमान किया है। तूने छल से मुझे नवग्रहों में सबसे छोटा सिद्ध किया है। तू मेरे वास्तविक प्रभाव और मेरी शक्तियों को नहीं जानता। इसलिए तूने यह दुस्साहस किया है।"
शनिदेव ने अपनी शक्ति का वर्णन करते हुए आगे कहा, "हे विक्रमादित्य! सुन, सूर्य एक राशि पर एक मास, चंद्रमा सवा दो दिन, मंगल डेढ़ मास, बुध और शुक्र एक-एक मास तथा गुरु तेरह मास तक रहते हैं। राहु और केतु डेढ़-डेढ़ वर्ष तक भ्रमण करते हैं। किंतु मेरी चाल सबसे मंद है। मैं जब किसी पर अपनी दृष्टि डालता हूँ, तो मैं साढ़े सात वर्ष (साढ़ेसाती) या ढाई वर्ष (ढैया) तक उस पर सवार रहता हूँ। मेरे भयंकर प्रकोप से बड़े-बड़े देवता, असुर और मनुष्य थर-थर कांपते हैं।"
शनिदेव ने राजा के अहंकार को तोड़ने के लिए कहा, "मेरी वक्र दृष्टि के कारण ही देवताओं के राजा इंद्र को अपना स्वर्ग छोड़कर भागना पड़ा था। मेरी ही दशा के कारण मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम को राज्याभिषेक के स्थान पर वनवास और माता सीता के हरण का दारुण दुःख भोगना पड़ा। जब रावण पर मेरी दृष्टि पड़ी, तो राम के हाथों उसकी सोने की लंका राख हो गई और उसके संपूर्ण वंश का नाश हो गया। सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र पर जब मेरी दशा आई, तो उन्हें अपना राज्य छोड़ना पड़ा, पत्नी और पुत्र को बेचना पड़ा और स्वयं एक चांडाल के घर दास बनकर श्मशान की रखवाली करनी पड़ी। राजा नल और रानी दमयंती को मेरी ही दशा के कारण राज्यहीन होकर वन-वन भटकना पड़ा और भूनी हुई मछलियां तक पानी में तैर कर भाग गईं। अब तू भी मेरे प्रकोप का सामना करने के लिए तैयार रह। मैं तेरा सारा राज-पाठ, धन-वैभव और यह अहंकार नष्ट कर दूंगा।"
ऐसा कहकर, क्रोध से फुफकारते हुए शनिदेव वहाँ से अंतर्ध्यान हो गए। राजा विक्रमादित्य यह सुनकर कुछ पल के लिए स्तब्ध रह गए, परंतु वे एक कर्मयोगी थे। राजा ने अपने भाग्य को दोष न देते हुए इसे कर्म का फल माना और शांति से इस श्राप को स्वीकार कर लिया । वे जानते थे कि विधाता का जो भी विधान है, वह अवश्य पूर्ण होगा。
शनि देव का घोड़ों के सौदागर के रूप में आगमन
समय अपनी गति से चलता रहा। अन्य देवताओं के जाने के कुछ समय पश्चात, राजा विक्रमादित्य की कुंडली में शनिदेव की साढ़ेसाती का भयंकर प्रभाव प्रारंभ हो गया । शनिदेव ने राजा का सर्वनाश करने और उन्हें उनके अहंकार का दंड देने की ठान ली थी。
एक दिन शनिदेव एक अत्यंत आकर्षक और रहस्यमयी घोड़ों के सौदागर (अश्व व्यापारी) का रूप धारण करके उज्जयिनी नगरी में आए । उनके साथ एक से बढ़कर एक दिव्य, सुंदर और तेज-तर्रार घोड़े थे। जब नगर में इन अद्भुत घोड़ों की चर्चा हुई, तो यह समाचार राजा विक्रमादित्य के कानों तक भी पहुँचा। अश्व-विद्या के अत्यंत प्रेमी राजा ने तुरंत अपने प्रमुख अश्वपाल (घोड़ों के रक्षक) को आज्ञा दी कि वह राजकोष से धन लेकर जाए और उस सौदागर से सबसे उत्तम घोड़े खरीद कर लाए ।
अश्वपाल ने सौदागर के पास जाकर कई अच्छे घोड़े खरीदे और सौदागर से निवेदन किया कि वह अपना सबसे सर्वोत्तम और अद्वितीय घोड़ा राजा विक्रमादित्य की व्यक्तिगत सवारी हेतु दे। सौदागर रूपी शनिदेव तो इसी अवसर की प्रतीक्षा में थे। उन्होंने एक अत्यंत मनमोहक, सुंदर और वायु के समान वेग वाले घोड़े को राजा के समक्ष प्रस्तुत किया。
राजा विक्रमादित्य उस घोड़े की सुंदरता और शारीरिक गठन देखकर मुग्ध हो गए। राजा ने सोचा कि ऐसा घोड़ा तो पूरे आर्यावर्त में किसी के पास नहीं होगा। घोड़े की चाल और शक्ति को परखने के लिए राजा विक्रमादित्य ज्यों ही उस घोड़े की पीठ पर सवार हुए, शनिदेव की माया ने अपना कार्य प्रारंभ कर दिया। वह घोड़ा वायु के वेग से सरपट दौड़ने लगा। राजा ने लगाम खींचकर उसे रोकने का बहुत प्रयास किया, परंतु वह घोड़ा किसी भी प्रकार नियंत्रण में नहीं आया ।
वन में भटकाव और घोर संकट की शुरुआत
वह मायावी घोड़ा राजा को उज्जयिनी नगरी से बहुत दूर, मीलों का सफर तय कराकर एक अत्यंत भीषण, घने और निर्जन वन (जंगल) में ले गया। वन के मध्य में पहुँचकर, जहाँ दिन में भी सूर्य का प्रकाश नहीं पहुँचता था, वह घोड़ा राजा को अपनी पीठ से नीचे गिराकर अचानक हवा में अंतर्ध्यान हो गया ।
राजा विक्रमादित्य घोर आश्चर्य में पड़ गए। उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा था कि यह क्या माया है। वे वन में रास्ता भटक चुके थे। दिशाओं का कोई ज्ञान नहीं था। राजा ने दिन भर वन में भटकते हुए मार्ग खोजने का प्रयास किया, परंतु उन्हें कोई मार्ग नहीं मिला। धीरे-धीरे संध्या हो गई और रात्रि का अंधकार छा गया。
भूख और प्यास से राजा के प्राण कंठ तक आ गए। उनका सारा राजसी वस्त्र कटीली झाड़ियों और कांटों में उलझकर तार-तार हो गया। उनके शरीर पर खरोंचे आ गईं और रक्त बहने लगा। कल तक जो चक्रवर्ती सम्राट मखमल के गद्दों पर सोता था, आज वह एक दरिद्र और भिखारी के समान प्रतीत होने लगा । राजा को अब स्मरण आया कि यह सब शनिदेव की चेतावनी और साढ़ेसाती का ही प्रताप है। परंतु राजा विक्रमादित्य ने अपने धैर्य को नहीं खोया। उन्होंने किसी भी क्षण शनिदेव को या अपने भाग्य को नहीं कोसा, बल्कि सब कुछ कर्म का फल मानकर चुपचाप सहते रहे ।
सेठ के घर आश्रय और खूंटी द्वारा हार निगलने का अद्भुत प्रसंग
अत्यंत घोर कष्ट सहते हुए, राजा विक्रमादित्य वन से किसी प्रकार बाहर निकले और पैदल चलते-चलते एक पड़ोसी नगर (राज्य) में पहुँचे। भूख और थकान से व्याकुल होकर वे उस नगर के एक बड़े सेठ (साहूकार) की दुकान के सामने जाकर एक कोने में बैठ गए。
उसी समय शनिदेव की विचित्र लीला से, सेठ की दुकान पर अचानक ग्राहकों की भारी भीड़ उमड़ पड़ी और बहुत अच्छी बिक्री होने लगी। सेठ ने बहुत सारा धन कमाया। सेठ ने देखा कि जब से यह फटे-पुराने वस्त्रों वाला भिखारी मेरी दुकान के सामने आकर बैठा है, तब से मेरी दुकान में लक्ष्मी की वर्षा हो रही है। सेठ ने सोचा कि यह व्यक्ति देखने में तो निर्धन लगता है, परंतु है बहुत भाग्यशाली ।
सेठ ने राजा विक्रमादित्य को आदरपूर्वक उठाया और उनसे उनका परिचय पूछा। परंतु राजा विक्रमादित्य ने अपनी दुर्दशा और लज्जा के कारण अपना वास्तविक परिचय छिपा लिया और स्वयं को एक साधारण परदेसी यात्री बताया ।
सेठ अत्यंत प्रसन्न था, अतः वह राजा विक्रमादित्य को सम्मानपूर्वक अपने घर ले गया। सेठ ने राजा को अच्छे वस्त्र दिए, उन्हें स्नान कराया और नाना प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजनों से उन्हें भरपेट भोजन कराया । भोजन के पश्चात सेठ ने राजा को विश्राम करने के लिए अपने घर का एक अत्यंत सुंदर और एकांत कक्ष दिया。
उस कक्ष की दीवार पर एक अत्यंत सुंदर मोर के आकार की खूंटी लगी हुई थी। उसी खूंटी पर सेठ की पत्नी का एक अत्यंत बहुमूल्य नौलखा मोतियों का हार टंगा हुआ था। राजा विक्रमादित्य बिस्तर पर लेटे हुए विश्राम कर रहे थे और उनकी दृष्टि उस हार पर थी。
तभी राजा विक्रमादित्य के देखते-देखते एक अद्भुत, अविश्वसनीय और रोंगटे खड़े कर देने वाली घटना घटी। दीवार पर लगी वह निर्जीव खूंटी अचानक सजीव हो उठी। उस मोर रूपी खूंटी ने अपना मुंह खोला और टंगे हुए उस बहुमूल्य नौलखे हार को धीरे-धीरे निगलना प्रारंभ कर दिया। राजा विक्रमादित्य यह सब अपनी आँखों से देख रहे थे, परंतु वे कुछ कर न सके। वे स्तब्ध रह गए। देखते ही देखते वह खूंटी पूरा हार निगल गई ।
कुछ समय पश्चात जब सेठ उस कक्ष में आया, तो उसने देखा कि खूंटी पर हार नहीं है। उसने राजा से पूछा, "हे परदेसी! इस खूंटी पर मेरी पत्नी का जो बहुमूल्य हार टंगा था, वह कहाँ गया? क्या तुमने उसे कहीं रख दिया है?"
राजा ने अत्यंत सहजता और सत्य वचन कहते हुए उत्तर दिया, "सेठ जी! यह अत्यंत विचित्र और अविश्वसनीय बात है, परंतु मैंने अपनी आँखों से देखा है कि मेरे देखते-देखते उस दीवार पर लगी खूंटी ने आपका पूरा हार निगल लिया है।"
राजा को घोर दंड: हाथ-पैर कटना
सेठ यह उत्तर सुनकर क्रोध से आग-बबूला हो गया। उसने सोचा कि यह निर्धन व्यक्ति हार चुरा कर झूठ बोल रहा है। भला एक काठ की निर्जीव खूंटी भी कहीं हार निगल सकती है? यह स्पष्ट रूप से एक चोर है जिसने मेरे ही घर में सेंध लगाई है。
सेठ ने तुरंत अपने सेवकों को बुलाया और राजा विक्रमादित्य को बंधक बनाकर रस्सियों से जकड़ दिया। सेठ उन्हें उस नगर के राजा के दरबार में ले गया । सेठ ने राजा से गुहार लगाई, "महाराज! मैंने इस परदेसी पर दया करके इसे अपने घर में आश्रय दिया, भोजन कराया और इसने मेरे ही घर से मेरी पत्नी का बहुमूल्य हार चुरा लिया। और जब मैंने इससे पूछा, तो यह झूठ बोल रहा है कि हार खूंटी निगल गई है। आप इसे कठोर से कठोर दंड दें।"
नगर के राजा ने क्रोधित होकर विक्रमादित्य को चोर समझ लिया। शनिदेव के कुप्रभाव के कारण विक्रमादित्य की मुखाकृति का सारा तेज समाप्त हो चुका था। राजा ने बिना कोई जांच किए अत्यंत कठोर दंड सुनाया। राजा ने जल्लादों को आज्ञा दी, "इस पाखंडी चोर के दोनों हाथ और दोनों पैर काट दिए जाएँ और इसे नगर के बाहर चौराहे पर तड़पने के लिए फिंकवा दिया जाए।"
शनिदेव के कोप के कारण विक्रमादित्य की कोई पुकार नहीं सुनी गई। जल्लादों ने विक्रमादित्य को नगर के बाहर ले जाकर, बिना किसी दया के उनके दोनों हाथ और दोनों पैर तलवार से काट डाले और उन्हें एक निर्जन चौराहे पर तड़पने के लिए छोड़ दिया ।
राजा विक्रमादित्य रक्त से लथपथ होकर, असहनीय पीड़ा सहते हुए भूमि पर पड़े रहे। परंतु इस घोर संकट में भी उन्होंने एक बार भी अपने भाग्य को या शनिदेव को नहीं कोसा। उन्होंने सत्य, धर्म और धैर्य का मार्ग नहीं छोड़ा। वे मन ही मन यही सोचते रहे कि यह सब उनके पूर्व कर्मों और शनिदेव के अपमान का ही फल है, जिसे उन्हें भोगना ही पड़ेगा ।
तेली के घर आश्रय और कोल्हू चलाना
कुछ दिन उस चौराहे पर तड़पने और भूख-प्यास से तड़पने के पश्चात, उस मार्ग से एक तेली (तेल निकालने का कार्य करने वाला व्यक्ति) अपनी बैलगाड़ी लेकर गुज़र रहा था। उसने उस कटे हुए हाथ-पैर वाले व्यक्ति की दयनीय स्थिति देखी। तेली का हृदय करुणा से भर गया। उसने राजा विक्रमादित्य के पास जाकर पूछा, "तुम्हारी यह दुर्दशा किसने की?"
विक्रमादित्य ने क्षीण स्वर में कहा, "यह सब मेरे पूर्व जन्मों के पापों का फल है।"
तेली को उन पर बहुत दया आई। उसने राजा विक्रमादित्य को उठाकर अपनी बैलगाड़ी में रखा और अपने घर ले आया । तेली ने राजा के घावों को धोया, उन पर औषधियों का लेप लगाया और उन्हें भोजन कराया। तेली की सेवा से राजा के घाव धीरे-धीरे भरने लगे और वे कुछ स्वस्थ हुए。
जब राजा कुछ स्वस्थ हुए, तो तेली ने उन्हें एक कार्य सौंप दिया। उसने राजा को अपने तेल निकालने वाले कोल्हू (यंत्र) पर बैठा दिया। राजा विक्रमादित्य बिना हाथ-पैर के कोल्हू पर बैठकर बैलों को हांकने और उन्हें दिशा दिखाने का कार्य करने लगे। महान चक्रवर्ती सम्राट, जिसके एक इशारे पर लाखों सेनाएं दौड़ी चली आती थीं, आज एक साधारण तेली के घर कोल्हू चला रहा था। परंतु राजा ने इसे भी ईश्वर की इच्छा मानकर स्वीकार कर लिया ।
मल्हार राग का गायन और राजकुमारी का मोहित होना
इसी प्रकार कोल्हू चलाते और कष्ट सहते-सहते राजा विक्रमादित्य पर शनिदेव की साढ़ेसाती (साढ़े सात वर्ष) पूर्ण होने का समय आ गया ।
वर्षा ऋतु का समय था। एक रात्रि राजा विक्रमादित्य तेली के घर कोल्हू पर बैठे हुए थे। आकाश में घने काले बादल छाए हुए थे और ठंडी हवाएं चल रही थीं। राजा को अपने पूर्व सुखों, अपनी रानियों और अपनी उज्जयिनी नगरी की स्मृति हो आई। वे भाव-विभोर हो उठे। उनके हृदय की पीड़ा और वेदना उनके कंठ से फूट पड़ी। भावुक होकर राजा ने अत्यंत सुरीले और दर्द भरे स्वर में 'मल्हार राग' गाना प्रारंभ किया ।
राजा का स्वर इतना मधुर, शास्त्रीय और प्रभावकारी था कि ऐसा प्रतीत हुआ मानो प्रकृति भी उनके स्वर में स्वर मिला रही हो। आकाश से रिमझिम वर्षा होने लगी। उसी समय उस नगर के राजा की अत्यंत लावण्यमयी पुत्री, राजकुमारी मनभावनी (जिसे कुछ कथाओं में मोहिनी या पद्मावती भी कहा जाता है), अपने महल की छत पर अपनी सखियों के साथ सो रही थी। उसने जब वह मल्हार राग सुना तो वह मंत्रमुग्ध हो गई ।
राजकुमारी ने ऐसा गायन अपने जीवन में कभी नहीं सुना था। उसने तुरंत अपनी दासियों को भेजा कि "जाकर पता लगाओ कि इतनी रात्रि में यह मधुर राग कौन गा रहा है? वह अवश्य ही कोई महान गंधर्व या देवपुरुष होगा।"
दासियों ने नगर में जाकर पता लगाया और लौटकर राजकुमारी को बताया, "हे राजकुमारी! वह कोई गंधर्व नहीं है, बल्कि तेली के घर रहने वाला एक अपाहिज व्यक्ति है, जिसके हाथ-पैर कटे हुए हैं। वह कोल्हू पर बैठकर गा रहा है।"
यह सुनकर भी राजकुमारी का मन विचलित नहीं हुआ। वह उस स्वर पर इतनी मोहित हो चुकी थी कि उसने अपने माता-पिता के समक्ष हठ कर ली और प्रतिज्ञा कर ली कि "मैं विवाह करूंगी तो उसी अपाहिज गायक से करूंगी, अन्यथा आजीवन कुंवारी रहूंगी।"
अगले दिन जब नगर के राजा को अपनी पुत्री की इस हठ का पता चला तो वह अत्यंत कुपित और दुखी हुआ। राजा और रानी ने राजकुमारी को बहुत समझाया कि "पुत्री! तू एक राजकुमारी है, तेरा विवाह किसी महान राजा से होगा। वह एक अपाहिज और भिखारी है, उसके साथ तेरा जीवन कैसे बीतेगा?" परंतु राजकुमारी अपने निश्चय पर अडिग रही। उसने अन्न-जल त्याग दिया। अंततः विवश होकर राजा ने भारी मन से उस अपाहिज (विक्रमादित्य) के साथ अपनी पुत्री का विवाह करने का निश्चय किया。
शनि देव का साक्षात् दर्शन, क्षमा और खोए हुए अंगों की प्राप्ति
विवाह की रात्रि, जब साढ़े सात वर्ष (साढ़ेसाती) की अवधि पूर्ण हुई, न्याय के देवता और कर्मफलदाता श्री शनिदेव राजा विक्रमादित्य के स्वप्न में (या कुछ मान्यताओं में साक्षात्) प्रकट हुए ।
शनिदेव का स्वरूप अत्यंत दिव्य और तेज़मय था। उन्होंने राजा से कहा, "राजन! तूने मुझे नवग्रहों में सबसे छोटा बताने का दुस्साहस किया था। तूने देख लिया कि मेरा प्रकोप कितना भयंकर है? मेरे ही कारण तुझे अपना राज्य खोना पड़ा, भिखारी बनना पड़ा, चोर कहलाना पड़ा और अपने हाथ-पैर भी गवाने पड़े।"
राजा विक्रमादित्य ने शनिदेव को पहचान लिया। उन्होंने अत्यंत अश्रुपूर्ण नेत्रों से शनिदेव की स्तुति की, उन्हें दंडवत प्रणाम किया और अपनी भूल स्वीकार करते हुए क्षमा याचना की। राजा ने कहा, "हे शनिदेव! हे सूर्यपुत्र! हे छाया नंदन! मैंने अज्ञानतावश आपका अपमान किया था। मुझमें अपने राज-पद और न्याय का अहंकार आ गया था। मेरी भूल के लिए मुझे जो दंड मिला, वह सर्वथा उचित था। मैं आपके न्याय को नमन करता हूँ।"
राजा ने आगे अत्यंत करुण और परोपकारी स्वर में प्रार्थना की, "हे प्रभु! हे दीनानाथ! जैसी पीड़ा और घोर कष्ट आपने मुझे दिया है, वैसी पीड़ा इस संसार में किसी अन्य प्राणी को कभी मत देना। मैं तो एक मजबूत इंसान था, इसलिए यह दारुण पीड़ा सह गया, परंतु कलियुग के सामान्य लोग इसे सहन करने में सक्षम नहीं होंगे। वे नष्ट हो जाएंगे। मेरी आपसे यही प्रार्थना है कि किसी पर ऐसा कोप न करें।"
शनिदेव राजा विक्रमादित्य के असीम धैर्य, सत्य-निष्ठा और इतने कष्ट सहने के बाद भी परोपकार की भावना देखकर अत्यंत प्रसन्न हुए। शनिदेव ने मुस्कुराते हुए कहा, "हे राजन! मैं तुम्हारे धैर्य और सत्य के आचरण से पूर्णतः संतुष्ट हूँ। मैं केवल पाप का नहीं, बल्कि व्यक्ति के कर्मों का फल देता हूँ। जाओ, मैं तुम्हें तुम्हारा सब कुछ वापस लौटाता हूँ।"
ऐसा कहते हुए शनिदेव ने राजा विक्रमादित्य को आशीर्वाद दिया। उसी क्षण एक महान चमत्कार हुआ। राजा के कटे हुए हाथ और पैर पुनः शरीर से जुड़ गए। उनके घाव भर गए और वे पहले की भाँति पूर्ण स्वस्थ, अत्यंत सुंदर और कांतिवान हो गए । शनिदेव ने राजा को यह भी उपदेश दिया कि "संसार में सभी को मेरी यह कथा सुनाना और शनिवार का मेरा व्रत-पूजन करना। जो श्रद्धा से मेरा पूजन करेगा, उसके सब कष्ट मैं दूर करूँगा।" ऐसा कहकर शनिदेव अंतर्ध्यान हो गए。
सत्य का प्रकटीकरण, सेठ का पश्चाताप और राजकुमारी से विवाह
प्रातः काल जब तेली ने राजा विक्रमादित्य को पूर्ण स्वस्थ और हाथ-पैरों के साथ देखा, तो वह अत्यंत आश्चर्यचकित हुआ और भयभीत भी। राजा ने उसे अपना वास्तविक परिचय दिया और शनिदेव के प्रकोप तथा उनकी कृपा की संपूर्ण कथा विस्तार से सुनाई । यह समाचार पूरे नगर में जंगल की आग की तरह फैल गया。
जब नगर के राजा को ज्ञात हुआ कि तेली के घर रहने वाला अपाहिज व्यक्ति कोई और नहीं बल्कि आर्यावर्त के प्रतापी चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य हैं, तो वह नंगे पैर दौड़ता हुआ तेली के घर आया। राजा ने विक्रमादित्य के चरणों में गिरकर क्षमा माँगते हुए कहा, "हे महाराज! मैंने अज्ञानतावश आपको कठोर दंड दिया, मुझे क्षमा करें।"
राजा विक्रमादित्य ने उसे हृदय से लगाते हुए क्षमा किया और कहा, "इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं है, यह तो केवल शनिदेव के प्रकोप का फल था।" इसके पश्चात नगर के राजा ने अपनी पुत्री राजकुमारी मनभावनी का विवाह अत्यंत हर्षोल्लास, भव्यता और अपार दान-दहेज के साथ राजा विक्रमादित्य के साथ संपन्न कर दिया ।
उधर, उस नगर के सेठ को भी जब यह समाचार मिला कि जिसे उसने चोर समझकर हाथ-पैर कटवा दिए थे, वे महान राजा विक्रमादित्य हैं, तो वह भय से कांप उठा। उसे लगा कि अब विक्रमादित्य उसे मृत्युदंड देंगे। वह दौड़ता हुआ आया और राजा के चरणों में गिरकर गिड़गिड़ाते हुए क्षमा माँगने लगा ।
राजा विक्रमादित्य ने अपनी महानता का परिचय देते हुए सेठ को भी क्षमा कर दिया। सेठ ने करबद्ध निवेदन किया कि, "महाराज! मेरे मन को शांति तभी मिलेगी जब आप मेरे घर चलकर मेरा आतिथ्य स्वीकार करेंगे और मेरे घर भोजन करेंगे।" राजा ने उसका यह आग्रह मान लिया और अपनी नई रानी के साथ सेठ के घर भोजन करने गए ।
सेठ ने नाना प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजनों से राजा का सत्कार किया। जब राजा उसी कक्ष में भोजन कर रहे थे, जहाँ खूंटी ने हार निगला था, तभी एक और आश्चर्यजनक घटना घटी। वहाँ उपस्थित सभी लोगों के देखते ही देखते उस मोर के आकार की खूंटी ने अपना मुंह खोला और वह नौलखा हार वापस उगल दिया । यह देखकर सेठ और वहाँ उपस्थित सभी लोगों को शनिदेव की शक्तियों और उनकी महिमा पर पूर्ण विश्वास हो गया。
सेठ ने अपनी भूल का प्रायश्चित करते हुए अनेक मोहरें, स्वर्ण-आभूषण देकर राजा का धन्यवाद किया और अपनी अत्यंत सुंदर कन्या 'श्री कंवरी' का पाणिग्रहण (विवाह) भी राजा विक्रमादित्य के साथ कर दिया ।
राजा का स्वदेश लौटना और शनि महिमा का राज्य में उद्घोष
कुछ दिन वहाँ सत्कार प्राप्त करने के पश्चात, राजा विक्रमादित्य अपनी दोनों नवविवाहित रानियों—राजकुमारी मनभावनी और सेठ की पुत्री श्री कंवरी—तथा अपार धन-संपत्ति, दास-दासियों, रथों और पालकियों के साथ अपनी राजधानी उज्जयिनी की ओर लौट चले ।
साढ़े सात वर्षों से उज्जयिनी की प्रजा अपने प्रिय राजा के वियोग में दुखी थी। जब नगरवासियों ने अपने राजा के सकुशल लौटने का समाचार सुना, तो वे सीमा पर ही उनका स्वागत करने के लिए उमड़ पड़े । सारे नगर में दीपमाला की गई, घर-घर में उत्सव मनाया गया और मांगलिक गीत गाए गए ।
अगले दिन राजा विक्रमादित्य ने अपने दरबार में पूरे राज्य में यह राज्याज्ञा और उद्घोषणा कराई: "हे प्रजाजनों! मैंने अज्ञानतावश भगवान शनिदेव को सबसे छोटा बताया था, जबकि असल में वे ही सर्वोपरि और सर्वश्रेष्ठ हैं। वे सबसे महान, शक्तिशाली और न्यायकारी देवता हैं। मेरी सभी प्रजा प्रत्येक शनिवार के दिन शनिदेव का व्रत करे, उनका विधि-विधान से पूजन करे और उनकी यह पावन व्रत-कथा अवश्य सुने।"
राजा की इस घोषणा और श्रद्धा से शनिदेव अत्यंत प्रसन्न हुए। तब से सारे राज्य में शनिदेव की पूजा और व्रत-कथा नियमित रूप से होने लगी। राजा विक्रमादित्य और उनकी प्रजा शनिदेव की अनुकंपा से दीर्घकाल तक सुख, शांति, समृद्धि और आनंदपूर्वक जीवन व्यतीत करने लगे ।
३. द्वितीय पारंपरिक आख्यान: निर्धन ब्राह्मण और मतीरे (कद्दू) की कथा
शनिवार व्रत के अवसर पर कई पारंपरिक व्रत-पुस्तिकाओं और लोक-परंपराओं में निर्धन ब्राह्मण और कद्दू (मतीरे) की कथा का भी विशेष वाचन होता है। यह कथा भी पूर्ण रूप से शनिदेव के दंड, उनके चमत्कार और उनकी करुणा पर आधारित है ।
ब्राह्मण पर शनि की दशा का प्रभाव
प्राचीन काल में किसी नगर में एक अत्यंत निर्धन और कर्मकांडी ब्राह्मण रहता था। वह नित्य प्रति भगवान का भजन करता और भिक्षा मांगकर अपने तथा अपने परिवार का भरण-पोषण करता था। एक दिन ब्राह्मण मार्ग से जा रहा था कि भगवान शनिदेव उसके सम्मुख प्रकट हुए। शनिदेव ने कहा, "हे ब्राह्मण! मैं न्याय का देवता शनि हूँ। आज से तुझ पर मेरी दशा (साढ़ेसाती) लगने वाली है। अब तू अपने दुर्दिन के लिए तैयार हो जा।"
यह सुनकर ब्राह्मण भयभीत तो हुआ, परंतु उसने अत्यंत विनम्रता से हाथ जोड़कर कहा, "हे शनि महाराज! मैं तो पहले से ही अत्यंत निर्धन हूँ। भिक्षा मांगकर किसी तरह परिवार का जीवन काट रहा हूँ। मेरी दशा और क्या बिगड़ेगी? फिर भी यदि आप मुझ पर दशा लगाना ही चाहते हैं, तो यह आपकी इच्छा है, परंतु हे कृपानिधान! इस संकट में मेरी रक्षा भी आप ही कीजिएगा।"
शनिदेव ब्राह्मण की बात सुनकर कुछ बोले नहीं और वहाँ से अंतर्ध्यान हो गए。
कद्दू का कटा हुआ सिर बनना और प्राण-संकट
अगले दिन ब्राह्मण भिक्षा मांगकर घर लौट रहा था। उसे भिक्षा में कुछ पैसे मिले थे। उसने सोचा कि घर में बच्चे भूखे होंगे, आज उनके लिए बाजार से कुछ फल ले चलूँ। उसने बाजार से एक बड़ा मतीरा (कद्दू/तरबूज) खरीदा और उसे अपने झोले (ठेले) में रख लिया ।
उसी दिन उस नगर के राजा का इकलौता पुत्र (राजकुमार) अचानक शिकार खेलते हुए कहीं लापता हो गया था। राजा के सिपाही राजकुमार को चारों ओर खोज रहे थे। जब ब्राह्मण मतीरा लेकर जा रहा था, तो शनिदेव की माया से ब्राह्मण के झोले से मतीरे का रस रक्त (खून) में परिवर्तित होकर मार्ग पर टपकने लगा। सिपाहियों ने झोले से रक्त टपकता देख ब्राह्मण को रोक लिया。
जब सिपाहियों ने ब्राह्मण का झोला खोलकर देखा, तो उनके होश उड़ गए। शनि की वक्र दृष्टि के प्रभाव से उस झोले में रखा मतीरा, राजकुमार के कटे हुए सिर में बदल गया था । सिपाहियों ने तुरंत ब्राह्मण को पकड़ लिया और हथकड़ियां पहनाकर राजा के दरबार में पेश किया。
राजा ने अपने प्रिय पुत्र का कटा हुआ सिर देखा तो वह चीत्कार कर उठा और विलाप करने लगा। क्रोध में आकर राजा ने उस निर्दोष ब्राह्मण को तुरंत मृत्युदंड (फांसी) की सजा सुना दी ।
ब्राह्मण को बंदीगृह में डाल दिया गया। अगले दिन सुबह फांसी पर चढ़ने की तैयारी हो गई। ब्राह्मण समझ गया कि यह सब शनिदेव की दशा का ही कुप्रभाव है। वह बंदीगृह में बैठा हुआ निरंतर शनिदेव का स्मरण और प्रार्थना करने लगा। "हे शनि महाराज! मुझसे जो भी भूल हुई हो, मुझे क्षमा करें। मैं निर्दोष हूँ, मेरी रक्षा करें प्रभु!"
दशा की समाप्ति और मतीरे का रत्नों में परिवर्तित होना
जब ब्राह्मण को फांसी के तख्ते पर ले जाया जा रहा था, तभी आकाश मंडल में ग्रहों की स्थिति बदली और ब्राह्मण पर से शनिदेव की दशा का समय पूर्ण हो गया ।
ब्राह्मण ने राजा से अंतिम इच्छा के रूप में प्रार्थना की, "महाराज! मैं मरने के लिए तैयार हूँ, परंतु मुझे फांसी देने से पहले कृपया मेरे झोले को एक बार पुनः खोलकर देख लिया जाए।"
राजा ने सिपाहियों को आज्ञा दी। जैसे ही सिपाहियों ने झोला खोला, तो वहाँ उपस्थित सभी लोग हतप्रभ रह गए। देखा कि वहाँ राजकुमार का कोई सिर नहीं था। दशा उतरते ही वह सिर पुनः एक मतीरे (कद्दू) में बदल गया था और केवल इतना ही नहीं, वह पूरा झोला हीरे, मोती और बहुमूल्य स्वर्ण रत्नों से भर गया था ।
उसी समय एक घुड़सवार दौड़ा हुआ आया और उसने शुभ समाचार दिया कि राजकुमार सकुशल महल में लौट आया है। वह वन में शिकार खेलते हुए मार्ग भटक गया था। राजा को अपने कृत्य पर अत्यंत पश्चाताप हुआ। उसने ब्राह्मण को ससम्मान मुक्त कर दिया और वह धन-रत्नों से भरा झोला भी भेंट स्वरूप ब्राह्मण को सौंप दिया。
ब्राह्मण वह अपार धन लेकर जब अपने घर पहुँचा, तो उसकी पत्नी वह झोला देखकर आश्चर्यचकित रह गई। पत्नी ने पूछा, "स्वामी! आप यह इतना सारा धन कहाँ से लाए हैं? क्या आप कोई चोरी करके आए हैं?"
तब ब्राह्मण ने अपनी पत्नी को सारी कथा विस्तार से सुनाई और कहा, "हे भद्रे! जब शनिदेव की दशा लगी थी, तो यह मतीरा राजकुमार का कटा हुआ सिर बन गया था और मेरे फांसी पर चढ़ने की तैयारी हो गई थी। अब जब दशा उतरी है, तो शनि महाराज ने प्रसन्न होकर मतीरे की जगह धन कर दिया और हमें निहाल कर दिया।"
ब्राह्मण ने गदगद कंठ से हाथ जोड़कर प्रार्थना की, "हे शनि महाराज! जैसी दशा आपने इस ब्राह्मण की लगाई, वैसी किसी की ना लगाना। और जैसी उतरती दशा में आपने हम पर कृपा की, वैसी कृपा संसार के सब प्राणियों पर करना।" बोलिए शनिदेव महाराज की जय ।
४. तृतीय पारंपरिक आख्यान: पिपल देवता (शनि स्वरूप) और दरिद्र ब्राह्मण की कथा
कुछ लोक-परंपराओं और विशेष रूप से ग्रामीण अंचलों में शनिवार के दिन पिपल वृक्ष (जिसमें शनिदेव का वास माना जाता है) की पूजा और उससे संबंधित दरिद्र ब्राह्मण की कथा भी पढ़ी जाती है। यह कथा भी भक्त के प्रति भगवान की असीम करुणा का प्रतीक है ।
ब्राह्मण की दरिद्रता और पिपल देवता की पूजा
एक नगर में एक अत्यंत दरिद्र ब्राह्मण अपनी पत्नी के साथ रहता था। उसकी कुटिया इतनी जर्जर थी कि वर्षा का पानी सीधे अंदर आता था और खाने के लिए अक्सर अन्न का एक दाना भी नहीं होता था। परंतु वह ब्राह्मण अत्यंत धर्मनिष्ठ और संतोषी था। वह प्रत्येक शनिवार को नियमपूर्वक ब्रह्म मुहूर्त में उठता, स्नान करता और पिपल के वृक्ष के पास जाता था। वह शनिदेव का स्मरण करते हुए पिपल के वृक्ष की जल, रोली, अक्षत और पुष्प से पूजा करता, दीप जलाता और सात परिक्रमा करता था। वह अपनी दरिद्रता दूर करने के लिए पिपल देवता (शनिदेव) से निरंतर प्रार्थना करता रहता था。
शनि देव का आशीर्वाद और कुटिया का महल बनना
ब्राह्मण की वर्षों की अटूट भक्ति, नियम और निष्ठा से पिपल देवता (श्री शनिदेव) अत्यंत प्रसन्न हो गए। एक शनिवार को जब ब्राह्मण अपनी दैनिक पूजा और परिक्रमा करके वापस अपनी कुटिया की ओर लौट रहा था, तो उसने देखा कि जहाँ उसकी टूटी-फूटी घास-फूस की कुटिया हुआ करती थी, वहाँ एक अत्यंत विशाल और भव्य संगमरमर का महल खड़ा है ।
ब्राह्मण को लगा कि वह रास्ता भूल गया है या किसी दूसरे मोहल्ले में आ गया है। वह घबराकर पीछे मुड़कर वापस जाने लगा। तभी उस भव्य महल के द्वार से एक अत्यंत सजी-धजी स्त्री बाहर आई। उसने रेशम और ज़री की बहुमूल्य साड़ी पहन रखी थी और उसके शरीर पर स्वर्ण और हीरों के गहने सजे हुए थे । ब्राह्मण देवता उस राजसी वेष में अपनी ही पत्नी को पहचान न सके。
उस ब्राह्मणी ने ब्राह्मण को आवाज़ लगाई और कहा, "अरे स्वामी! आप कहाँ जा रहे हैं? अपने ही घर में क्यों नहीं आते?" ब्राह्मण ने आश्चर्य से आँखें फाड़कर पूछा, "तुम्हारा यह भेष कैसे बदल गया? यह इतने सारे गहने, इतने सुंदर कपड़े कहाँ से आए? और हमारी वह पुरानी कुटिया कहाँ गई, यह महल किसका है?"
तब ब्राह्मणी ने प्रसन्नतापूर्वक हाथ जोड़कर उत्तर दिया, "यह सब आपके पिपल देवता (शनिदेव) का आशीर्वाद है। उन्होंने आपकी सच्ची भक्ति देखकर आपकी मनोकामना पूरी कर दी है। आपने उनसे जो भी मांगा था, उन्होंने सब दे दिया है। आप अंदर तो चलिए, सब पता चल जाएगा।"
जब ब्राह्मण देवता संकोच करते हुए महल अंदर गए, तो देखते क्या हैं कि घर में अपार धन-धान्य भरा पड़ा है, दास-दासियां काम कर रहे हैं और उनका बहुत बड़ा परिवार—बेटे, पोते, नाती—सब प्रसन्नता से घूम रहे हैं। ब्राह्मणी ने कहा, "देखिए, यह सारा परिवार और वैभव हमारा ही है।"
अब तो ब्राह्मण देवता अत्यंत प्रसन्न हो गए। उनके नेत्रों से आनंद और कृतज्ञता के अश्रु छलक पड़े। उन्होंने मन ही मन पिपल देवता (श्री शनिदेव) को दंडवत प्रणाम किया और कोटि-कोटि धन्यवाद दिया। उन्होंने प्रार्थना की, "हे पिपल देवता! हे शनिदेव! जैसे आपने इस निर्धन ब्राह्मण की मनोकामना पूरी की, वैसे ही आपकी पूजा करने वाले, आपकी कथा पढ़ने वाले और कथा सुनने वाले, सभी भक्तों की मनोकामना पूरी करना।" बोलिए पिपल महाराज की जय, श्री शनिदेव महाराज की जय ।
५. कथा का पारंपरिक उपसंहार, फलश्रुति एवं आरती
उपरोक्त तीनों कथाओं के सस्वर वाचन के पश्चात शनिवार व्रत-कथा का पारंपरिक समापन 'फलश्रुति' (कथा सुनने और व्रत करने के फल का वर्णन) और आरती के साथ किया जाता है। व्रत-पुस्तिकाओं में वर्णित यह फलश्रुति अत्यंत पावन और सिद्ध मानी गई है। पारंपरिक पाठ के अनुसार अंत में निम्न फल-वचनों का वाचन अनिवार्य है:
फल-वचन (पारंपरिक दोहे)
"तैसह चार चरण यह नामा स्वर्ण लौह चांदी अरुतामा।
लौह चरण पर जब प्रभु आवे धन जन संपत्ति नष्ट करावे।।
समता ताम्र रचत शुभकारी स्वर्ण सर्व सर्व सुख मंगल भारी।
जो यह शनि चरित्र नित गावे कबहु न दशा निकृष्ट सतावे।।
अद्भुत नाथ दिखावे लीला करे शत्रु के नशिबल ढीला।
जो पंडित सुयोग्य बुलवाई विधिवत शनि ग्रह शांति कराई।।
पीपल जल शनि दिवस चढ़ावत दीप दान दे बहु सुख पावत।
कहत राम सुंदर प्रभु दासा शनि सुमिरत सुख होत प्रकाशा।।"
गद्य फलश्रुति
"जो कोई प्राणी श्रद्धापूर्वक शनिदेव की इस पावन कथा को सुनता है या पढ़ता है, उसके सारे दुःख दूर हो जाते हैं। व्रत के दिन इस कथा को अवश्य पढ़ना चाहिए। शनिवार का व्रत करने, चीटियों को आटा खिलाने, काले कुत्ते को रोटी देने और व्रत कथा सुनने मात्र से शनिदेव की असीम अनुकंपा बनी रहती है और जातक की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं。
राजा विक्रमादित्य, निर्धन ब्राह्मण और सेठ की भाँति जो भी भक्त सच्चे हृदय से अपनी भूल स्वीकार कर शनिदेव की शरण में जाता है, न्यायप्रिय शनिदेव उसके सभी संकट हर लेते हैं और उसे सुख, समृद्धि एवं मोक्ष प्रदान करते हैं । इसी प्रकार से जो भी भक्त सच्ची श्रद्धा के साथ, नियम और निष्ठा के साथ शनिवार का व्रत करते हैं, शनि देवता की पूजा करते हैं, आराधना करते हैं, कथा श्रवण करते हैं और आरती करते हैं, उनसे न्यायप्रिय शनिदेव प्रसन्न होकर अपनी असीम कृपा प्रदान करते हैं।"
श्री शनिदेव जी की पारंपरिक आरती
कथा की पूर्णता श्री शनिदेव की इस पारंपरिक आरती के गान से होती है, जिसे सभी भक्त खड़े होकर कपूर और दीपक के साथ गाते हैं:
"जय जय श्री शनिदेव भक्तन हितकारी।
सूरज के पुत्र प्रभु छाया महतारी॥
॥ जय जय श्री शनिदेव..॥
श्याम अंक वक्र दृष्ट चतुर्भुजा धारी।
नीलाम्बर धार नाथ गज की असवारी॥
॥ जय जय श्री शनिदेव..॥
क्रीट मुकुट शीश रजित दिपत है लिलारी।
मुक्तन की माला गले शोभित बलिहारी॥
॥ जय जय श्री शनिदेव..॥
मोदक मिष्ठान पान चढ़त हैं सुपारी।
लोहा तिल तेल उड़द महिषी अति प्यारी॥
॥ जय जय श्री शनिदेव..॥
देव दनुज ऋषि मुनि सुमरिन नर नारी।
विश्वनाथ धरत ध्यान शरण हैं तुम्हारी॥
॥ जय जय श्री शनिदेव..॥"
अंत में सभी भक्तजन हाथ जोड़कर एक स्वर में जयकारा लगाते हैं:
"बोलो श्री शनिदेव महाराज की जय!"
"जय जय श्री शनिदेव भक्तन हितकारी, सूरज के पुत्र प्रभु छाया महतारी।"