विस्तृत उत्तर
गणेश जी को हाथी का सिर लगाने की कथा शिव पुराण में विस्तार से वर्णित है।
जब शिव जी ने क्रोधावेश में गणेश जी का सिर काट दिया और माता पार्वती ने अपने पुत्र को निष्प्राण देखा, तो उनका क्रोध इतना विकराल हो गया कि सृष्टि में प्रलय का संकट उत्पन्न हो गया। ब्रह्मा, विष्णु सहित सभी देवता भयभीत हो गए और उन्होंने पार्वती से विनती की। पार्वती जी ने कहा — 'जब तक मेरे पुत्र को पुनर्जीवित नहीं किया जाएगा, मेरा क्रोध शांत नहीं होगा।'
शिव जी ने पुत्र को जीवित करने का संकल्प किया, परंतु त्रिशूल से कटे हुए सिर को पुनः जोड़ना संभव नहीं था क्योंकि त्रिशूल का प्रहार अपरिवर्तनीय होता है। अतः नया सिर लाने का निर्णय किया गया। शिव पुराण के अनुसार शिव जी ने अपने गणों को आदेश दिया — 'उत्तर दिशा में जाओ, रास्ते में जो सबसे पहला प्राणी मिले — जो अपनी माँ की तरफ पीठ करके सो रहा हो — उसका सिर काटकर लाओ।'
गण उत्तर दिशा में गए और उन्हें सर्वप्रथम एक हाथी का बच्चा ऐसी स्थिति में मिला। वे उसका सिर लेकर आए। शिव जी ने उस हाथी के सिर को गणेश जी के धड़ से जोड़ा और दिव्य मंत्रों के बल से उनमें प्राण डाल दिए। तत्काल गणेश जी जीवित हो उठे। माता पार्वती का हृदय आनंद से भर गया। उसी समय ब्रह्मा, विष्णु और अन्य देवताओं ने आकर गणेश जी को गणपति, गणेश, विघ्नहर्ता और प्रथम पूज्य की उपाधि दी।




