विस्तृत उत्तर
शिव पुराण के विद्येश्वर संहिता (अध्याय 25) में रुद्राक्ष की उत्पत्ति का विस्तृत और प्रामाणिक वर्णन है।
शिव पुराण में स्वयं भगवान शिव माता अन्नपूर्णा से कहते हैं — 'मैं समस्त लोकों का उपकार करने वाला परमेश्वर हूँ। एक समय मैंने लोक कल्याण के लिए दीर्घकाल तक तपस्या की। तपस्या के बाद जब मैंने लीलावश अपने दोनों नेत्र खोले, तो मेरे नेत्रों से कुछ जल की बूंदें गिरीं। उन अश्रु-बिंदुओं से रुद्राक्ष नामक वृक्ष उत्पन्न हो गए।'
देवी भागवत पुराण में एक अन्य कथा भी मिलती है जिसके अनुसार त्रिपुरासुर नामक असुर ने तीनों लोकों में हाहाकार मचा दिया था। देवता परेशान होकर शिव के पास गए। शिव ने देवताओं की पीड़ा सुनकर योग मुद्रा में नेत्र बंद किए। जब नेत्र खोले तो उनसे करुणामय अश्रु गिरे और जहाँ-जहाँ वे अश्रु गिरे, वहाँ-वहाँ रुद्राक्ष के वृक्ष उग आए।
शिव पुराण में भगवान शिव आगे कहते हैं कि उन्होंने रुद्राक्ष गौड़ देश, मथुरा, अयोध्या, लंका, मलयागिरि, काशी सहित अनेक पवित्र स्थलों पर उत्पन्न कराए और उन्हें विष्णु भक्तों तथा चारों वर्णों के लोगों में बाँटा। 'रुद्र' अर्थात शिव और 'अक्ष' अर्थात नेत्र — इसीलिए इन्हें रुद्राक्ष कहा गया। ये शिव के नेत्रों के अश्रु हैं, इसलिए ये साक्षात शिव का स्वरूप हैं।





